प्रेम जीवन का विशुद्ध रस । प्रेम माधुरी जी का सान्निध्य जंहा अमृत के प्याले पिलाए जाते है ।प्रेम माधुर्य वेबसाइट से हमारा प्रयास है कि इस से एक संवेदना जागृत हो ।

Wednesday, January 23

मै तो तेरे रंग में रंगी...


मै तो तेरे रंग में रंगी...
तेरी जुस्तजू मुझे हर घड़ी...
जाऊ-मै-जाऊ पिया की गली..मै....तो तेरे रंग में रंगी...मै तो तेर रंग में रंगी..
पिया.....पिया.......पिया.......

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Sunday, January 13

स्वामी हरिदास जी


परिचय
श्री बांकेबिहारीजी महाराज को वृन्दावन में प्रकट करने वाले स्वामी हरिदासजी का जन्म विक्रम सम्वत् 1535 में भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की अष्टमी (श्री राधाष्टमी) के ब्रह्म मुहूर्त में हुआ था। आपके पिता श्री आशुधीर जी अपने उपास्य श्रीराधा-माधव की प्रेरणा से पत्नी गंगादेवी के साथ अनेक तीर्थो की यात्रा करने के पश्चात अलीगढ जनपद की कोल तहसील में ब्रज आकर एक गांव में बस गए। श्री हरिदास जी का व्यक्तित्व बड़ा ही विलक्षण था। वे बचपन से ही एकान्त-प्रिय थे। उन्हें अनासक्त भाव से भगवद्-भजन में लीन रहने से बड़ा आनंद मिलता था। श्री हरिदासजी का कण्ठ बड़ा मधुर था और उनमें संगीत की अपूर्व प्रतिभा थी। धीरे-धीरे उनकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई। उनका गांव उनके नाम से विख्यात हो गया। हरिदास जी को उनके पिता ने यज्ञोपवीत-संस्कार के उपरान्त वैष्णवी दीक्षा प्रदान की। युवा होने पर माता-पिता ने उनका विवाह हरिमति नामक परम सौंदर्यमयी एवं सद्गुणी कन्या से कर दिया, किंतु स्वामी हरिदास जी की आसक्ति तो अपने श्यामा-कुंजबिहारी के अतिरिक्त अन्य किसी में थी ही नहीं। उन्हें गृहस्थ जीवन से विमुख देखकर उनकी पतिव्रता पत्नी ने उनकी साधना में विघ्न उपस्थित न करने के उद्देश्य से योगाग्नि के माध्यम से अपना शरीर त्याग दिया और उनका तेज स्वामी हरिदास के चरणों में लीन हो गया।

विक्रम सम्वत् 1560 में पच्चीस वर्ष की अवस्था में श्री हरिदास वृन्दावन पहुंचे। वहां उन्होंने निधिवन को अपनी तपोस्थली बनाया। हरिदास जी निधिवन में सदा श्यामा-कुंजबिहारी के ध्यान तथा उनके भजन में तल्लीन रहते थे। स्वामीजी ने प्रिया-प्रियतम की युगल छवि श्री बांकेबिहारीजी महाराज के रूप में प्रतिष्ठित की। हरिदासजी के ये ठाकुर आज असंख्य भक्तों के इष्टदेव हैं। वैष्णव स्वामी हरिदास को श्रीराधा का अवतार मानते हैं। श्यामा-कुंजबिहारी के नित्य विहार का मुख्य आधार संगीत है। उनके रास-विलास से अनेक राग-रागनियां उत्पन्न होती हैं। ललिता संगीत की अधिष्ठात्री मानी गई हैं। ललितावतार स्वामी हरिदास संगीत के परम आचार्य थे। उनका संगीत उनके अपने आराध्य की उपासना को समर्पित था, किसी राजा-महाराजा को नहीं। बैजूबावरा और तानसेन जैसे विश्व-विख्यात संगीतज्ञ स्वामी जी के शिष्य थे। मुग़ल सम्राट अकबर उनका संगीत सुनने के लिए रूप बदलकर वृन्दावन आया था। विक्रम सम्वत 1630 में स्वामी हरिदास का निकुंजवास निधिवन में हुआ।
back links-http://hi.bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8
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Thursday, September 6

हास्य-ध्यान



 It costs nothing, but creates much. It enriches those who receive, without impoverishing those who give. It happens in a flash and the memory of it sometimes lasts forever.” Dale Carnegie on smiling
" चुटकले का उद्देश्य चुटकुला ही नहीं है । इससे पौदा होने वाला हास्य है क्योकि हास्य के उन क्षणों में तुम्हारे विचार रुक जाते है। उस हंसी में मन नहीं रह जाता और हंसी के बाद एक छोटा सा अन्तराल और मेरी बात तुम्हारे गहनतम केंद्र तक प्रवेश कर जाती है "।
"आनंदित व्यक्ति में व्यक्तित्व होता है; दुखी व्यक्ति में कोई व्यक्तित्व नहीं होता। दुखी व्यक्ति भीड़ का हिस्सा होता है; आनंदित व्यक्ति व्यक्ति होता है, उसमे एक निजता होती है। और आनंदित व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता को किसी भी मूल्य पर खोने को राजी नहीं हो सकता, क्योंकि वह जानता है उसका आनंद भी उसी क्षण खो जाएगा जिस क्षण स्वतंत्रता खोएगी।"
ओशो
  • मुन्ना स्कूल जा रहा था। ढब्बू जी ने देखा, उसने बस्ता भी उठा रखा है और सीढ़ी भी। उन्हें बड़ी हैरानी हुई। मुन्ने से पूछने लगे, यह सीढ़ी लेकर किधर जा रहे हो, साहब?'
    पापाजी, मास्टरजी ने कहा है कि मैं इम्तिहान में पास हो गया हूँ और आज से ऊपर की क्लास में बैठूगां।' मुन्ने ने जवाब दिया।

  • मुन्ना भागता हुआ ढब्बूजी के पास आया और बोला, पापा, पापा! आज हमारे नए पड़ोसी ने मुझसे मेरा नाम पूछा।'
    ढब्बूजी खुश हो गए। उत्साहित होकर बोले, 'शाबाश! फिर?'
    'फिर उन्होने पुलिसवालों को दे दिया!'

  • मुन्ना सुबह से पेड़ के नीचे खड़ा था। एक सज्जन दो-तीन बार वहां से गुजरे और मुन्ने को ज्यों का त्यों खड़ा देखकर बड़े प्रभावित हुए। आखिर उनसे नहीं रहा गया तो वे ढब्बूजी के पास जाकर बोले, 'ढब्बूजी, आपका मुन्ना बड़ा ही शरीफ है! सवेरे से एक ही जगह चुपचाप खड़ा है!'
    ढब्बूजी ने कहा, 'भाई साहब, दरअसल, आज मुन्ना ने पहली बार गले में टाई बाँधी है और वह यह समझकर चुप खड़ा है कि किसी ने उसे पेड़ से बाँध दिया है।'

  • एक दिन एक बुजुर्ग ढब्बूजी के पास आए। बड़े दुःखी लग रहे थे। आते ही ढब्बूजी से मुन्ने की शिकायत करने लगे, 'अपने मुन्ने की हिम्मत तो देखो! उसने मुझे बूढ़ा घोड़ा कहा। बताओ, अब मैं करूं तो क्या करूं?'
    'आप कुछ मत कीजिए।' ढब्बूजी ने उन्हें समझाया, 'बहुत जल्द मैं एक तांगा खरीदने वाला हूं..'

  • ढब्बूजी डॉक्टर को फोन कर रहे थे - 'डॉक्टर साहब! मेरी पत्नी को सांस लेने में बहुत तकलीफ हो रही है। बुखार तो इतना है कि आप बदन छू नहीं सकते। पिछले दस घंटे से वह बेहोश है। अगर एकाध महीने में इस ओर आपका चक्कर लगे तो यहाँ आना भूलिएगा नहीं!'

  • 'पिताजी! हमारी घड़ी का घंटा यदि तेरह बार बजे तो वह क्या वक्त होगा?'
    'बेवकूफ मुन्ने! ऐसा कोई वक्त नहीं होता!'
    'गलत! वह घड़ी ठीक करवाने का वक्त होता है।'

  • मुन्नाः पिताजी, अगर मैं आपको दस रूपये के घाटे से बचा लूं तो आप मुझे पांच रुपए देंगे?
    ढब्बूजीः जरूर!
    मुन्नाः तब निकालिए पांच का नोट! आपने वचन दिया था कि अगर मैं इम्तिहान में पास हो गया तो आप मुझे दस रूपये देंगे। मैं फेल हो गया हूं।
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Wednesday, August 22

तूझे एक दिन खुद को पहाचानना हैं |

झमाने कि चिंता में, काहे पडा हैं |
तेरे साथ साई, तुझे फिक्र क्या हैं ||

तूझे एक दिन खुद को पहाचानना हैं |
तेरी आत्मा हि परमात्मा हैं ||
जमाने कि .....

किसी और में हैं चलने कि शक्ती |

तू कैसे समझता हैं खुद चळ रहा हैं ||
जमाने कि  .....

कहां तक सजाएगा अपने बदन को |
ये हैं बोज इसको यही छोडना हैं ||
जमाने कि .....

गले से लगा गम कि कथिनाइयो को |
तेरे पिछले जन्मो का ये सिलसिला हैं ||
जमाने कि .....

खाता करनेवाले सजा तो मिलेगी |
तुझे तेरे अंदर से वोह देखता हैं ||
जमाने कि .....

वो आगाज हैं और वो अंजाम तेरा |
वो हि इब्तदा hai, वो हि इंतीहा हैं ||
जमाने कि .....
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वो फुल ना अबतक चुन पाया

वो फुल ना अबतक चुन पाया

वो फुल ना अबतक चुन पाया
जो फुल चडाने है तुज पर

मैं तेरा द्वार न दूंढ़ सका
साई भटक रहा हूँ डगर डगर

मुज्मे मैं ही दोष रहा होगा
मन तुझको अर्पण कर न सका

तू मुजको देख रहा कबसे
मैं तेरा दर्शन कर न सका

हर दिन हर पल चलता रहता
संग्राम कहीं मन के भीतर

मैं तेरा द्वार...

क्या दुःख क्या सुख क्या भूल मेरी
मैं उल्जा हूँ इन बातो मैं

दिन खोया चांदी सोने मैं
सोया मैं बेसुध रातों मैं

तब ध्यान किया मैंने तेरा
टकराया पग से जब पथ्थर

मैं तेरा द्वार

मैं धुप छाव के बिच कही
माटी के तन को लिए फिरा

उस जगह मुझे थामा तुने
मैं भूल से जिस जगह गिरा

अब तुही पथ दिखला मुजको
सदियों से हूँ घर से बेघर

मैं तेरा द्वार
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आंखे बंद करूँ या खोलूं

आंखे बंद करूँ या खोलूं
मुझको दर्शन दे देना .
दर्शन दे देना, साईं मुझे
दर्शन दे देना ..
मैं नाचीज़ हूँ बन्दा तेरा
तू सबका दाता है .
तेरे हाथ मैं सारी दुनिया
मेरे हाथ मैं क्या है
तुझको देखूं जिसमे एसा
दर्पण दे देना ..
आंखे बंद करूँ या .........

मेरे अन्दर तेरी लहरें
रिश्ता है सदियों का .
जैसे इक नाता होता है
सागार का नादुयों का .
करूँ साधना तेरी केवल
साधना दे देना ..
आंखे बंद करूँ या .........


हम सब हैं सितायें तेरी sai_face
हम सब राम तुम्हारे .
तेरी कथा सुनते जायेंगे
बाबा तेरे सहारे .
इस जंगल में चाहे लाखों
रावण दे देना ..
आंखे बंद करूँ या .........


मेरी मांग बड़ी साधारण
मन में आते रहियो .
हर इक साँस के पीछे अपनी
जलक दिखलाते रहियो .
नाम तेरा ले आखिर तक
वो धड़कन दे देना

आँखे बंद करूँ या .........
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रोके ना हमें संसार.......

रोके ना हमें संसार.......
हमें साईं ने बुलाया है  .

अब कौन करे इनकार,
हमें साईं ने बुलाया है ..
मिला हमको सन्देश,
चलो दाता के देश .

पहनो चोला बस एक,
देखो बदलो ना भेस  .
लो हमसे बढ़ाकर प्यार,
हमें साईं ने बुलाया है ..
रोके ना हमें संसार.......


क्या ख़ुशी की ख़ुशी ,
क्या हमें गम का गम  .
जब तक है दम में दम,
चलते जायेंगे हम .
अब दूर नहीं दरबार,
हमें साईं ने बुलाया है ..
रोके ना हमें संसार.......

चाहे गाडी रुके,
चाहे तूफ़ान चले .
चाहे बादल उड़े,
चमके बिजली भले .
बैठेंगे ना  हिम्मत हार,
हमें साईं ने बुलाया है ..
रोके ना हमें संसार.......

माना मंजिल की और,   
है कठिन रास्ता .
हमको साईं के सिवा,
किस्से क्या वास्ता .
है बड़ा उपकार,
हमें साईं ने बुलाया है . .
रोके ना हमें संसार..
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