प्रेम जीवन का विशुद्ध रस । प्रेम माधुरी जी का सान्निध्य जंहा अमृत के प्याले पिलाए जाते है ।प्रेम माधुर्य वेबसाइट से हमारा प्रयास है कि इस से एक संवेदना जागृत हो ।

Tuesday, August 21

युवा पीढ़ी

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युवा पीढ़ी
वृद्ध पीढ़ी विरोध में है और जवान पीढ़ी अनुभवहीन है। रास्ता कौन बनायेगा? रास्ता बनाने के लिए दो चीजों की जरूरत है-अनुभव की और शक्ति की। शक्ति जवान के पास है, अनुभव बूढ़े के पास है
आंखों में उम्मीद के सपने, नयी उड़ान भरता हुआ मन, कुछ कर जाने का दमखम और दुनिया को अपनी मुट्ठी में करने वाले साहस को ही युवा कहा जाता है। युवा एक ऐसा शब्द जिसे सुनते ही मन उमंगे भरने लगता है। उम्र का यही वह पड़ाव है जहां बैठकर बाकी जिदंगी की किस्मत तय की जाती है। असम्भव को संभव में बदलने वाले युवा शक्ति की तादाद भारत में सबसे ज्यादा है। देश में 65 प्रतिशत जनसंख्या 35 वर्ष आयु तक के युवकों की और 25 साल उम्रं के नौजवानों की संख्या 50 प्रतिशत से भी अधिक है। इस युवा शक्ति का सही दिशा में उपयोग करना अत्यंत आवश्यक है। इनका जरा सा भी भटकाव देश की उन्नति को अवन्नित में बदल सकता है। युवाओ के बारे में ओशो कहते है, ''युवा होने का एक ही मतलब है-वैसी आत्मा विद्रोही की जो झुकना नहीं जानती, टूटना जानती है; जो बदलना चाहती है, जो जिंदगी को नई दिशाओं में, नये आयामों में ले जाना चाहती है, जो जिंदगी को परिवर्तन करना चाहती है। क्रांति की यह उद्याम आकांक्षा की युवा होने का लक्षण है।'' लेकिन सवाल यह है कि क्रांति की वह धधकती लौ आखिर है कहां?

आधुनिक समाज में मैटेरियलस्टिक होने की होड़ सी लगी हुई है। उसी दौड़ मे कहीं न कहीं युवा भी फंसता चला जा रहा है। पश्चिमीकरण के पहनावे और संस्कृति को अपनाने में उसे कोई हिचक नहीं होती है। आज किशोर भी 14-15 वर्ष की आयु में ही ड्रग्स, और डिस्कों का आदी हो रहा है। नशे की बढ़ती प्रवृत्ति ने हत्या और बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों को जन्म दिया है। जिससे इस युवा शक्ति का कदम अधंकार की तरफ बढता हुआ दिख रहा है। देश के नौजवानों को सही राह दिखाना अति आवश्यक है। ताकि जीवन की सार्थकता सिद्ध हो सके। वहीं सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि अपने महत्वाकांक्षाओ और दृढ़ निश्चय ने युवाओं का राजनीतिक और सामाजिक जीवन को भी ऊपर उठाया है।
ओशो कहते है, हमारा जवान मुश्किल में है, बहुत कठिनाई में है। और मेरी अपनी मान्यता है कि करूणा के योग्य है, क्रोध के योग्य नहीं। बहुत दया के योग्य है क्योंकि उसको कोई वसीयत नहीं छोड़ गया है। एक अर्थ में हमारा युवक अनाथ है। अनाथ इस अर्थों में कि उसकी जमीन की कोई वसीयत उसके पास नहीं है। उसकी पुरानी पीढ़ियां उसके लिए जीने योग्य, जिंदगी से रस निकालने योग्य, कोई भी तकनीक, कोई साइंस नहीं छोड़ गयी हैं। हां, उसे एक तरकीब बता दी है कि अगर तुम्हें मरना हो तो मोक्ष जाने का रास्ता है। अभी वह मरना नहीं चाहता है, वह जीना चाहता है-उसके लिए व्यर्थ है। इसलिए मंदिरों में, मस्जिदों में जवान दिखायी नहीं पड़ता। हां, लड़कियों वगैरह के खयाल से कोई जवान पहुंच गया हो तो बात अलग है। लेकिन मंदिर और मस्जिद के लिए जवान नहीं जाता, वहां बूढ़े इकटठे हो रहे हैं।
वहां बूढे क्यों दिखाई पड़ रहे है, उसका कारण है। उसका कारण है, बूढ़े की उत्सुकता बदल गयी। अब वह जिंदा रहने में उत्सुक नहीं है। अब वह ढंग से मरने में उत्सुक है। ठीक है, उसकी उत्सुकता गलत नहीं है। उसकी उत्सुकता की भी तृप्ति होनी चाहिए और उसके चिंतन को भी मार्ग मिलना चाहिए कि मृत्यु के बाद क्या है? लेकिन वह जवान का चिंतन नहीं है। तो हम कठिनाई में पड़ गये हैं। रास्ता नहीं है, रास्ता बनाना पड़ेगा।

कौन बनाएगा यह रास्ता? बड़ी जटिलता का सवाल है क्योंकि बूढ़े विरोध में है, वृद्व पीढ़ी विरोध में है और जवान पीढ़ी अनुभवहीन है। रास्ता कौन बनाएगा? रास्ता बनाने के लिए दो चीजों की जरूरत है-अनुभव की और शक्ति की। शक्ति जवान के पास है, अनुभव बूढ़े के पास है। उन दोनों के बीच कोई तालमेल नहीं है। रास्ता बनेगा कैसे? रास्ता बनाने के लिए हिन्दुस्तान की बूढ़ी पीढ़ी को जवान के प्रति सहानुभूतिपूर्ण होना पड़ेगा। अपने अनुभव से उसे सचेत करना पड़ेगा, जवान की शक्ति को नियोजित करना पडेगा। लेकिन बूढ़ी पीढ़ी निंदा में सलंग्न है। वह सिर्फ निंदा कर रही है वह सिर्फ गालियां दे रही है कि सब बिगड़ गये हैं। लेकिन यह कहने से कुछ फल नहीं होता। इससे अगर कोई बिगड़ भी गया हो तो उसे कोई सुधरने का मार्ग नहीं मिलता। अगर कोई न भी बिगड़ा हो तो बार-बार कहने से कि बिगड़ गया है, उसके चित्त में बिगड़ने की दिशा पैदा होती है।

नहीं, वृद्व पीढ़ी का बहुत ही कीमती समय यह है कि वह अपने सारे अनुभव पर ध्यान देकर भारत के लिए नया रास्ता बनाने में युवक की शक्ति का नियोजन कर सके। लेकिन यह तभी हो सकता है जब वृद्व-पुरानी पीढ़ी-नयी पीढ़ी की तरफ निंदा से न देखे, करूणा और प्रेम से देखे। लेकिन वृद्ध नाराज है। नाराज वह इसलिए है कि उसकी पुरानी सारी दुनिया अस्त-व्यस्त हो गयी है। नाराजगी का कारण दूसरा है। नाराजगी का कारण उसका अब तक का बनाया हुआ सारा ढांचा गिर गया है। जैसे मैं एक मकान बनाऊं और पूरा मकान गिर जाए और मैं अपने बेटे की पिटायी शुरू कर दूं। मेरा क्रोध तो उस मकान के गिर जाने के लिए है।
पुरानी संस्कृति का पूरा मकान गिर रहा है, गिर गया है। नाराजगी बेटे पर है। ऐसा लग रहा है कि ये बेटे मकान को गिराये दे रहे हैं। मकान, जैसा हमने बनाया था। हां बेटों ने अब तक उसे सहारा दिया था क्योंकि बेटों को हम बहुत जल्दी बूढ़ा बना देते हैं। अब बेटे उसको बचाने में सहायता नहीं दे रहे हैं। गिरा नहीं रहे, सिर्फ बचाने में सहायता नहीं दे रहे है। और बूढ़े हाथ कैसे किसी मकान को बचा सकते है? वह गिर रहा है। वे बेटों पर नाराज हैं। उस नाराजगी को छोड़ना पड़ेगा। और मेरी दृष्टि में अगर पिछली पीढ़ी नाराजगी को छोड़ दे तो नयी पीढ़ी उसके प्रति आदर से भर सकती है। जो निंदा करे उसके प्रति आदर नहीं हो सकता। नयी पीढ़ी उसके प्रति आदर से भर सकती है। जो निंदा करे उसके प्रति आदर नहीं हो सकता। नयी पीढी का आदर नहीं है पुरानी पीढ़ी के प्रति, क्योंकि पुरानी पीढ़ी सिवाय निंदा के और कुछ भी नहीं कर रही है।
-ओशो
पुस्तक: भारत के जलते प्रश्न
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कृष्ण का अर्थ

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कृष्ण का अर्थ
कृष्ण शब्द का अर्थ होता है, जिस पर संसारी चीजें खिचती हों, जो केंद्रीय चुंबक का काम करे
कृष्ण शब्द का अर्थ होता है, केंद्र। कृष्ण शब्द का अर्थ होता है, जो आकृष्ट करे, जो आकर्षित करे; सेंटर ऑफ ग्रेविटेशन, कशिश का केंद्र। कृष्ण शब्द का अर्थ होता है, जिस पर संसारी चीजें खिचती हों, जो केंद्रीय चुंबक का काम करे। प्रत्येक व्यक्ति का जन्म एक अर्थ में कृष्ण का जन्म है, क्योंकि हमारे भीतर जो आत्मा है, वह कशिश का केंद्र है। वह सेंटर ऑफ ग्रेविटेशन है जिस पर सब चीजें खिंचती हैं और आकृष्ट होती हैं। शरीर खिंच कर उसके आस-पास निर्मित होता है, परिवार खिच कर उसके आस-पास निर्मित होता र्है, समाज खिंच कर उसके आस-पास निर्मित होता है, जगत खिंच कर उसके आस-पास निर्मित होता है। वह जो हमारे भीतर कृष्ण का केंद्र है, आकर्षण का जो गहरा बिंदु है, उसके आस-पास सब घटित होता है। तो जब भी कोई व्यक्ति जन्मता है, तो एक अर्थ में कृष्ण ही जन्मता है। वह जो बिंदु है आत्मा का, आकर्षण का, वह जन्मता है। और उसके बाद सब चीजें उसके आस-पास निर्मित होनी शुरू होती हैं। उस कृष्ण-बिंदु के आस-पास क्रिस्टोलाइजेशन शुरु होता है और व्यक्तित्व निर्मित होते हैं। इसलिए कृष्ण का जन्म एक व्यक्ति विशेष का जन्मपात्र नहीं है, बल्कि व्यक्तिमात्र का जन्म है।
अंधेरे का, कारागृह का, मृत्यु के भय का अर्थ है। लेकिन हमने कृष्ण के साथ उस क्यों जोड़ा होगा? मैं यह नहीं कह रहा हूं कि जो कृष्ण की जिंदगी में घटना घटनी होगी कारागृह में, वह नहीं घटी है। मैं यह भी नहीं कह रहा हूं कि जो बंधन में पैदा हुए होंगे, वह नही हुए हैं। मैं इतना कह रहा हूं कि वे बंधन में हुए हो या न हुए हों, वे कारागृह में जन्मे हों या न जन्में हो, लेकिन कृष्ण जैसा व्यक्ति जब हमें उपलब्ध हो गया तो हमने कृष्ण के व्यक्तित्व के साथ वह सब समाहित कर दिया है जो कि प्रत्येक आत्मा के जन्म के साथ समाहित है।
ध्यान रहे, महापुरुषों की कथाएं जन्म की हमेशा उलटी चलती हैं। साधारण आदमी के जीवन की कथा जन्म से शुरू होती है और मृत्यु पर पूरी होती है। उसकी कथा में एक सिक्केंस होता है, जन्म से लेकर मृत्यु तक। महापुरुषों की कथाएं फिर से रिट्रास्पेक्टिवली लिखी जाती हैं। महापुरुष पहचान में आते हैं बाद में। और उनकी जन्म की कथाएं फिर बाद में लिखी जाती हैं। कृष्ण जैसा आदमी जब हमें दिखाई पड़ता है तब तो पैदा होने के बहुत बाद दिखाई पड़ता है। वर्षों बीत गए होते हैं उसे पैदा हुए। जब वह हमें दिखाई पड़ता है तब वह कोई चालीस-पचास साल की यात्रा कर चुका होता है। फिर इस महिमावान, इस अद्भुत व्यक्ति के आस-पास कथा निर्मित होती है। फिर हम चुनाव करते हैं इसकी जिंदगी का। फिर हम रीइंटरप्रीट करते हैं। फिर से हम इसके पिछले जीवन में से घटनाएं चुनते हैं, घटनाओं का अर्थ देते हैं।
इसलिए मैं आपसे कहूं कि महापुरुषों की जिंदगी कभी भी ऐतिहासिक नहीं हो पाती है, सदा काव्यात्मक हो जाती है। पीछे लौट कर निर्मित होती है। पीछे लौट कर जब हम देखते हैं तो हर चीज प्रतीक हो जाती है और दूसरे अर्थ ले लेती है, जो अर्थ घटते हुए क्षण में कभी भी न रहे होंगे। और फिर कृष्ण जैसे व्यक्तियों की जिदंगी एक बार नहीं लिखी जाती, हर सदी बार-बार लिखती है। हजारों लोग लिखते हैं। जब हजारों लोग लिखते हैं तो हजार व्याख्याएं होती चली जाती हैं। फिर धीरे-धीरे कृष्ण की जिंदगी किसी व्यक्ति की जिंदगी नहीं रह जाती। कृष्ण एक संस्था हो जाते हैं। एक इंस्टीटयूशन हो जाते हैं। फिर वे समस्त जन्मों का सारभूत हो जाते हैं। फिर मनुष्य मात्र के जन्म की कथा उनके जन्म की कथा हो जाती है।
इसलिए व्यक्तिवाची अर्थों में मैं कोई मूल्य नहीं मानता हूं। कृष्ण जैसे व्यक्ति व्यक्ति नहीं रह जाते। वे हमारे मानस के, हमारे चित्त के, हमारे कलेक्टिव माइंड के प्रतीक हो जाते हैं। और हमारे चित्त ने जितने भी जन्म देखे है, वे सब उनमें समाहित हो जाते हैं।
इसे ऐसा समझें। एक बहुत बड़े चित्रकार ने एक स्त्री का चित्र बनाया—एक बहुत सुंदर स्त्री का चित्र। लोगों ने उससे पूछा कि यह कौन स्त्री है, जिसके आधार पर इस चित्र को बनाया? उस चित्रकार ने कहाः यह किसी स्त्री का चित्र नहीं है। यह लाखों स्त्रियां जो मैंने देखी हैं, सबका सारभूत है। इसमें आंख किसी की है, इसमें नाक किसी की, इसमें ओठ किसी के हैं, इसमें रंग किसी का है, इसमें बाल किसी के है, ऐसी स्त्री कही खोजने से नहीं मिलेगी, ऐसी स्त्री सिर्फ चित्रकार देख पाता है। और इसलिए चित्रकार की स्त्री पर बहुत भरोसा मत करना, उसको खोजने मत निकल जाना, क्योंकि जो मिलेगी वह नहीं, साधारण स्त्री मिलेगी। इसलिए दुनिया बहुत कठिनाई में पड़ जाती है क्योंकि हम जिन स्त्रियों को खोजने जाते हैं वे कहीं हैं नहीं, वे चित्रकारों की स्त्रियां हैं, कवियों की स्त्रियां हैं, वे हजारों स्त्रियों का सारभूत हैं। वे इत्र हैं हजारों स्त्रियों का। वे कहीं मिलने वाली नहीं है। वे हजारों स्त्रियां मिल-जुल कर एक हो गई हैं। वह हजारों स्त्रियों के बीच में से खोजी गई धुन है।
तो जब कृष्ण जैसा व्यक्ति पैदा होता है, तो लाखों जन्मों में जो पाया गया है, उस सबका सारभूत उसमें समा जाता है। इसलिए उसे व्यक्तिवाची मत मानना। वह व्यक्तिवाची है भी नहीं। इसलिए अगर उसे कोई इतिहास में खोज करने जाएगा तो शायद कहीं भी न पाए। कृष्ण मनुष्य मात्र के जन्म के प्रतीक बन जाते हैं—एक विशेष मनुष्यता के, जो इस देश में पैदा हुई; इस देश की मनुष्यता ने जो अनुभव किया, वह उनमें समा जाता है। जीसस में समा जाता है किसी और देश का अनुभव, वह सब समाहित हो जाता है। हम अपने जन्म के साथ जन्मते हैं और अपनी मृत्यु के साथ मर जाते हैं। कृष्ण के प्रतीक में जुड़ता ही चला जाता है। अनंत काल तक जुड़ता चला जाता है। उस जोड़ में कभी कोई बाधा नहीं आती। हर युग उसमें जुड़ेगा, हर युग उसमें समृद्धि करेगा, क्योंकि और अनुभव इकट्ठे हो गए होंगे। और वह उस कलेक्टिव आर्च टाइप में जुड़ते चले जाएंगे।
लेकिन मेरे लिए जो मतलब दिखाई पड़ता है, वह मैंने आपसे कहा। ये घटनाएं घट भी सकती हैं, ये घटनाएं न भी घटी हों। मेरे लिए घटनाओं का कोई मूल्य नहीं है। मेरे लिए मूल्य कृष्ण को समझने का है कि इस आदमी में ये घटनाएं कैसे हमने देखीं। और अगर इनको हम ठीक से देख सकें तो ये घटनाएं हमें अपने जन्म में भी दिखाई पड़ सकती है वह अपनी मृत्यु तक पहुंचते-पहुंचते अपनी मृत्यु में भी कृष्ण की मृत्यु के तालमेल को उपलब्ध हो सके।
-ओशो
पुस्तकः कृष्ण स्मृति
प्रवचन नं. 6 से संकलित
(पूरा प्रवचन एम.पी.थ्री. पर भी उपलब्ध है।)
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तनाव और विश्राम

स्वास्थ्य
तनाव और विश्राम
हम शरीर में जो तनाव महसूस करते हैं, उसका मूल कारण है कुछ बनने की इच्छा। हर आदमी कुछ न कुछ बनने की चेष्टा कर रहा है। जो जैसा है, उसके साथ संतुष्ट नहीं है। हमारा होना स्वीकृति नहीं है, उसे इंकार किया जा सकता है और दूर कहीं एक लक्ष्य निर्मित किया जाता है। तो मूलभूत तनाव है-जो तुम हो और तुम बनना चाहते हो, उसके बीच की दूरी।

तुम जिसकी भी आकांक्षा करते हो वह भविष्य में पूरी होगी। आज तुम जो भी हो, उससे तुम्हारा कोई लेना-देना नहीं है। लक्ष्य जितना असंभव होगा, उतना तनाव अधिक होगा। तो भौतिकवादी आदमी इतना तनावपूर्ण नहीं होगा, जितना कि आध्यात्मिक व्यक्ति, क्योंकि उसका आदर्श व लक्ष्य बड़ा ऊंचा है।

तुम और तुम्हारे लक्ष्य के बीच जितनी दूरी होगी उतना तनाव अधिक, दूरी जितनी कम होगी, तनाव भी कम। यदि तुम स्वयं से पूर्णतया संतुष्ट हो तो तनाव बिल्कुल नहीं है। तुम इस क्षण में जीते हो। मेरी दृष्टि में, तुम्हारे होने और बनने के बीच कोई दूरी नहीं हो तो तुम धार्मिक हो।

इस दूरी के कई तल हो सकते हैं तुम जिसकी आकांक्षा करते हो, अगर वह कोई शारीरिक वस्तु है तुम्हारे भौतिक शरीर मे तनाव होगा। जैसे तुम सुंदर दिखना चाहते हो-इसका तनाव तुम्हारे भौतिक शरीर में शुरू होगा। यदि वह बना रहा, मजबूत होता चला गया तो भीतर के गहरे तलों पर पहुँचेगा।

यदि तुम मानसिक शक्ति के लिए तरस रहे हो तो मानसिक तल पर तनाव शुरू होगा और वहां से फैलेगा। इसका फैलना ऐसे ही है, जैसे तुम तालाब में पत्थर फेंको तो वह एक खास बिंदु पर गिरता है, लेकिन उसकी लहरें फैलती चली जाती हैं। तो तनाव तुम्हारे सात शरीरों में से किसी भी शरीर में शुरू हो सकता है, लेकिन इसका कारण वह बना रहता है-तुम्हारे होने और बनने के बीच की दूरी।

तनाव से मुक्त होने का एक ही उपाय है-स्वयं का संपूर्ण स्वीकार। संपूर्ण स्वीकार से चमत्कार घटित होता है। यह एकमात्र चमत्कार है। ऐसे व्यक्ति को खोजना, जिसने स्वयं को पूरी तरह से स्वीकार कर लिया है, एक आश्चर्यजनक घटना है।

अस्तित्व में कोई तनाव नहीं हैं। तनाव पैदा होता है गैर—अस्तित्वगत, काल्पनिक संभावनाओं से। वर्तमान में कोई तनाव नहीं है। कल्पना तुम्हें भविष्य की और दौड़ाती है, उसी से तनाव पैदा होता है। आदमी जितना कल्पनाशील हो, उतना तनाव में जीता है। तब फिर कल्पना विनाशक हो जाती है।

कल्पना रचनात्मक भी हो सकती है। यदि तुम्हारी कल्पना की पूरी क्षमता इस क्षण में केन्द्रित हो, आगे नहीं दौड़ रही हो तो तुम देख सकते हो कि तुम्हारा होना एक कविता है। तुम्हारी कल्पना शक्ति जीने में खर्च हो रही है, योजनाएं बनाने में नहीं। वर्तमान में जीना ही तनाव मुक्त जीना है।

...यदि तुम्हारा शरीर तनाव मुक्त वर्तमान में जी सके तो सही अर्थों में स्वास्थ्य का जन्म होता है। शरीर ऐसे विश्राम को उपलब्ध होता है, जो तुमने कभी नहीं जाना होगा। तब उसके लिए क्षण ही शाश्वत हो जाता है। फिर तो तुम भोजन ले रहे हो तो खाना ही सब कुछ होगा। उसके आगे न कुछ है, न पीछे कुछ है। भोजन करने वाला कोई नहीं होगा, भोजन की क्रिया ही सब कुछ होगी।

यदि तुम दौड़ लगा रहे हो और दौड़ना तुम्हारी समग्रता बन गई हैं, दौड़ने से जो संवेदनाएं उठ रही हैं, उनके साथ यदि तुम एक हो गए हो, उनसे अलग-थलग नहीं हो, तो तुम्हारा शरीर एक विधायक स्वास्थ्य को अनुभव करता है। शरीर के तल पर तुमने विश्रामपूर्ण अंतरतम को अनुभूत कर लिया।
-ओशो
'दी साइक्लोजी ऑफ दी इसोटेरिक'

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Thursday, July 19

HARIYALI TEEJ









Hariyali Teej or Hariyali Teej Vrat (Singhara Teej or Teejan) is a vrat or puja observed on the third day just after Hariyali Amavasya, in Shravan Month (July – August) of North Indian Hindi calendar. In 2013 Hariyali Teej date is 9th  august . This vrata is dedicated to Lord Shiva and Goddess Parvati. It is observed mainly by married and unmarried women of Rajasthan, Uttar Pradesh, Bihar, Madhya Pradesh, etc.
On Hariyali Teej vrat day, Lord Shiva and Goddess Parvati are worshipped. Women wear green bangles to symbolize the lush greenery during Sawan mahina and their prosperous life. Moon God is also worshipped in the evening after breaking the fast. Women also adorn their hands with Mehandi designs. Hariyali Teej is also known as Choti Teej.


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Thursday, May 31

लाडली अद्भुत नजारा तेरे बरसाने में है


लाडली अद्भुत नजारा तेरे बरसाने में है ..
लाडली अब मन हमारा तेरे बरसाने में है
बेसहारो को सहारा तेरे बरसाने में है ..

लाडली अद्भुत नजारा तेरे बरसाने में है ..
राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे श्री राधे 

राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे श्री राधे
राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे श्री

 राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे श्री राधे

झांकिया तेरे महल की कर रहे सब देव गण..
आ गया बैकुंठ द्वारा ..तेरे बरसाने में है
 राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे श्री राधे

हर लता  हर डाल पर तेरी दया की एक नजर ..
हर घडी यशुमति दुलारा..तेरे बरसाने में है
राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे श्री राधे

अब कहाँ  जाऊ  किशोरी तेरे दर को छोड़ कर..
मेरे जीवन का सहारा..तेरे बरसाने में है
राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे श्री राधे

मै भला हु  या बुरा हु पर तुम्हारा हु सदा..
अब तो जीवन का किनारा ..तेरे बरसाने में है
राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे श्री राधे
राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे श्री राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे श्री राधे
राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे श्री राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे श्री राधे
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Saturday, May 12

मेरी माँ





जब आंख खुली तो अम्मा की गोदी का एक सहारा था...
उसका नन्हा सा अंचल मुझ को भूमंडल से प्यारा था...
उसके चहरे की झलक देख चेहरा फूलो सा खिलता था...
उसके अंचल की एक बूंद से मुझे को जीवन मिलता था....
हाथो से बालो को नोचा...पैरो से खूब प्रहार किया...
फिर भी उस माँ ने पुचकारा हमें जी भर के प्यार किया...
"मै उसका रजा बेटा था..आंख का तारा कहती थी..
मै बनू बुडापे में उसका एक सहारा कहती थी...


उंगली को पकड़ चलाया था पढ़ने विद्यालय भेजा था...
मेरी नादानी को भी निज अंर्तमन में सदा सहेजा था...
मेरे सरे प्रशनो का वो फौरन जवाब बन जाती थी..
मेरे राह के कांटे चुग खुद गुलाब बन जाती थी....
माँ हंसती है तो धरती का जर्रा जर्रा मुस्काता है...
मन मेरे घर के दीवारों में चंदा की सूरत है...
पर मन के इस मंदिर में माँ की मूरत है ...
माँ सरस्वती..लक्ष्मी देवी..अनुसूया सीता है.....
माँ पावनता में राम चरित मानस..भगवत गीता है...
अम्मा मुझे तेरी हर बात वरदान से बड़ कर लगती है...
हे माँ मुझे तेरी सूरत भगवन से बड़ कर लगती है...
सारे तीर्थ के पुण्य जंहा मै उन चरणों में लेटा हूँ...
जिन के कोई संतान नही मै उन माओ का बेटा हूँ....
हर घर में माँ की पूजा हो ऐसा संकल्प उठाता हूँ ...
दुनिया की हर माँ की चरणों में ये शीश झुकाता हूँ..
यह बात तब कि है जब भगवान को दिन-रात कायनात का निर्माण करते हुए छठा दिन था और वो "मां" का निर्माण कर रहे थे। जब वे अपने काम में तल्लीन थे, तभी उनके सामने एक देवदूत आ खड़ा हुआ और उसने उनसे पूछा, "आप इस कृति को बनाने में इतना वक्त क्यों लगा रहे हैं?"  तब भगवान ने जवाब दिया, "दरअसल मुझे मेरी इस रचना को अनेक विलक्षणताओं के साथ बनाना है। जैसे, इसे सदैव निर्मल रहना है, साथ ही इसके अंग-अंग से सजीवता झलकनी चाहिए। इसके शरीर में 200 गतिमान हिस्से हैं। यह एक रचना होगी, जो थोड़ी सी चाय-कॉफी और बचे हुए खाने के सहारे भी जीवित रह सकेगी।"  "इसकी गोद इतनी विशाल होगी कि जिसमें तीन शिशु एक साथ आ सकें...। जिसके एक चुंबन से छिले हुए घुटने से लेकर टूटे हुए दिल तक , यानी सब कुछ ठीक हो जाएगा। इसे मैं छह हाथ भी देने जा रहा हूं।"  इन विलक्षण विशिष्टताओं को सुनकर दंग देवदूत बोला, "क्या आप इसे छह हाथ देने जा रहे हैं, पर इसकी क्या आवश्यकता?"  भगवान ने जवाब दिया, "अरे. असल समस्या ये छह हाथ नहीं हैं, मैं तो तीन जोड़ी आंखों को लेकर चिंतित हूं जो हर मां के पास होनी ही चाहिएं।" देवदूत ने कहा, "और तीन जोड़ी आंखें होने पर ही मां का मानक मॉडल तैयार होगा?"  भगवान ने हां में सिर हिलाया और बोले, "तुम बिल्कुल ठीक समझ रहे हो। एक जोड़ी आंखें बंद दरवाजे से भी झांकने में सक्षम होंगी, ताकि वह अपने बच्चों से पूछ सके कि वे क्या कर रहे हैं, जबकि वह अपनी इन आंखों के कारण पहले ही जानती होगी कि उसके बच्चे क्या कर रहे हैं।"  "आंखों की दूसरी जोड़ी सिर के पीछे होगी, ताकि वह हर उस बात को जान सके जिसे उसको जानने की जरूरत है और लोग सोच भी न सकें कि इसकी जानकारी उसे हो भी सकती है।"  "और तीसरी जोड़ी आंखें उसके माथे पर होंगी ताकि वह राह से भटके अपने बच्चों पर नजर रख सके और बगैर एक शब्द कहे अपने बच्चों से कह सके कि वह उनसे कितना प्यार करती है।"  अब देवदूत ने भगवान को रोकने की कोशिश की, "भगवान, आपने आज दिन भर में काफी काम कर लिया है। आप काम खत्म करने के लिए कल का इंतजार भी तो कर सकते हैं।"   भगवान ने प्रतिरोध किया, बोले, "नहीं, मैं नहीं कर सकता। मैं अपनी इस कृति को पूरा करने के बहुत करीब हूं जो मेरे दिल के काफी करीब है। यह एक ऎसी कृति है, जब वो बीमार होगी तो अपना इलाज और देखभाल खुद करेगी। जिसे बहुत कम संसाधनों में छह लोगों का पेट पालना आता होगा।" अब देवदूत भगवान के करीब आ गया और उसने उस औरत को छुआ, चौंककर बोला, "लेकिन भगवान आपने तो इसे बहुत ही कोमल बनाया है।"  भगवान सहमत होते हुए बोले, "हां, यह बहुत ही कोमल है, लेकिन मैंने इसे बहुत कठोर भी बनाया है। तुम्हें अंदाजा भी नहीं है कि यह क्या-क्या सहन कर सकती है और क्या-क्या काम कर सकती है।" "तो क्या यह सोच भी सकेगी?" देवदूत ने पूछा।  अब भगवान ने जवाब दिया, "यह न केवल सोच सकेगी, बल्कि तर्क दे सकेगी, समस्याओं को सुलझा सकेगी।"  तभी देवदूत ने कुछ नोटिस किया। वह भगवान की उस कृति तक पहुंचा और उसने उसके गालों को छुआ और तुरंत बोला, "अरे भगवान, ऎसा लगता है कि आपने इस रचना में एक कमी छोड़ दी है। मैंने कहा था न कि आप इस कृति को ज्यादा ही विलक्षणताएं प्रदान करने का प्रयास कर रहे हैं।" भगवान ने प्रतिरोध किया, "नहीं, यह कोई कमी नहीं है। ये आंसू हैं।"  "ये आंसू किस लिए?" देवदूत ने पूछा। भगवान ने जवाब दिया, "ये आंसू इसका अपनी खुशी, अपना दुख, अपनी निराशा, अपने दर्द, अपने अकेलेपन और यह तक कि अपने गर्व को भी जताने का तरीका होगा।" अब देवदूत काफी प्रभावित था और वह बोला..."भगवान आप महान् हैं, आपने मां को सब कुछ सोचकर बनाया है। आपकी यह कृति सर्वोत्तम है।"  इरमा बॉमबैक
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