प्रेम जीवन का विशुद्ध रस । प्रेम माधुरी जी का सान्निध्य जंहा अमृत के प्याले पिलाए जाते है ।प्रेम माधुर्य वेबसाइट से हमारा प्रयास है कि इस से एक संवेदना जागृत हो ।

Wednesday, August 22

बाँसुरी

  • बाँसुरी अत्यंत लोकप्रिय सुषिर वाद्य यंत्र माना जाता है, क्योंकि यह प्राकृतिक बांस से बनायी जाती है, इसलिये लोग उसे बांस बांसुरी भी कहते हैं।
  • बाँसुरी बनाने की प्रक्रिया काफ़ी कठिन नहीं है, सब से पहले बांसुरी के अंदर के गांठों को हटाया जाता है, फिर उस के शरीर पर कुल सात छेद खोदे जाते हैं। सब से पहला छेद मुंह से फूंकने के लिये छोड़ा जाता है, बाक़ी छेद अलग अलग आवाज़ निकले का काम देते हैं।
  • बाँसुरी की अभिव्यक्त शक्ति अत्यंत विविधतापूर्ण है, उस से लम्बे, ऊंचे, चंचल, तेज़ व भारी प्रकारों के सूक्ष्म भाविक मधुर संगीत बजाया जाता है। लेकिन इतना ही नहीं, वह विभिन्न प्राकृतिक आवाज़ों की नक़ल करने में निपुण है, मिसाल के लिये उससे नाना प्रकार के पक्षियों की आवाज़ की हू-ब-हू नक्ल की जा सकती है।
बाँसुरी बजाते हुए कृष्ण
  • बाँसुरी की बजाने की तकनीक कलाएं समृद्ध ही नहीं, उस की किस्में भी विविधतापूर्ण हैं, जैसे मोटी लम्बी बांसुरी, पतली नाटी बांसुरी, सात छेदों वाली बांसुरी और ग्यारह छेदों वाली बांसुरी आदि देखने को मिलते हैं और उस की बजाने की शैली भी भिन्न रूपों में पायी जाती है।
  • बाँसुरी, वंसी, वेणु, वंशिका आदि कई सुंदर नामो से सुसज्जित है।
  • प्राचीनकाल में लोक संगीत का प्रमुख वाद्य था बाँसुरी।
  • मुरली और श्री कृष्ण एक दूसरे के पर्याय रहे हैं। मुरली के बिना श्री कृष्ण की कल्पना भी नहीं की जा सकती । उनकी मुरली के नाद रूपी ब्रह्म ने सम्पूर्ण चराचर सृष्टि को आलोकित और सम्मोहित किया ।
  • कृष्ण के बाद भी भारत में बाँसुरी रही, पर कुछ खोयी खोयी सी, मौन सी। मानो श्री कृष्ण की याद में उसने स्वयं को भुला दिया हो, उसका अस्तित्व तो भारत वर्ष में सदैव रहा।
  • वह कृष्ण प्रिया थी, किंतु श्री हरी के विरह में जो हाल उनके गोप गोपिकाओ का हुआ कुछ वैसा ही बाँसुरी का भी हुआ।
  • युग बदल गए, बाँसुरी की अवस्था जस की तस रही, युगों बाद में पंडित पन्नालाल घोष जी ने अपने अथक परिश्रम से बांसुरी वाद्य में अनेक परिवर्तन कर, उसकी वादन शैली में परिवर्तन कर बाँसुरी को पुनः भारतीय संगीत में सम्माननीय स्थान दिलाया। लेकिन उनके बाद पुनः: बाँसुरी एकाकी हो गई।
  • आज हरिप्रसाद चौरसिया जी का बाँसुरी वादन विश्व प्रसिद्ध है।
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ओशो जी

गुरु को खोजने का अर्थ है : अंहकार का समर्पण ।किसी के चरणों में झुकाने का अर्थ है : झुकने की कला का पहला अभ्यास । झुक गए तो खुदा तो मिल ही जायेगा । बस तुम झुके न थे, वही अड़चन थी ।
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तानसेन

संगीत सम्राट् तानसेन (जन्म- संवत 1563, बेहट ग्राम; मृत्यु- संवत 1646) की गणना भारत के महान गायकों, मुग़ल संगीत के संगीतकारों एवं बेहतरीन संगीतज्ञों में की जाती है। तानसेन का नाम अकबर के प्रमुख संगीतज्ञों की सूची में सर्वोपरि है। तानसेन दरबारी कलाकारों का मुखिया और समाट् के नवरत्नों में से एक था। इस पर भी उसका प्रामाणिक जीवन-वृत्तांत अज्ञात है। यद्यपि काव्य-रचना की दृष्टि से तानसेन का योगदान विशेष महत्त्वपूर्ण नहीं कहा जा सकता, परंतु संगीत और काव्य के संयोग की दृष्टि से, जो भक्तिकालीन काव्य की एक बहुत बड़ी विशेषता थी, तानसेन साहित्य के इतिहास में अवश्य उल्लेखनीय है। उसके जीवन की अधिकांश घटनाएँ किंवदंतियों एवं अनुश्रुतियों पर आधारित हैं। प्रसिद्ध कृष्ण-भक्त स्वामी हरिदास इनके दीक्षा-गुरु कहे जाते हैं। "चौरासी वैष्णवन की वार्ता" में सूर से इनके भेंट का उल्लेख हुआ है। "दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता" में गोसाई विट्ठलनाथ से भी इनके भेंट करने की चर्चा मिलती है।

जीवन परिचय

तानसेन की जीवनी के सम्बन्ध में बहुत कम ऐसा वृत्त ज्ञात है, जिसे पूर्ण प्रामाणिक कहा जा सके। भारतीय संगीत के प्रसिद्ध गायक तानसेन का जन्म मुहम्मद ग़ौस नामक एक सिद्ध फ़क़ीर के आशीर्वाद से ग्वालियर से सात मील दूर एक छोटे-से गाँव बेहट में संवत 1563 में वहाँ के एक ब्राह्मण कुल में हुआ था।[2] इनके पिता का नाम मकरंद पांडे था। पांडित्य और संगीत-विद्या में लोकप्रिय होने के साथ-साथ मकरंद पांडे को धन-धान्य भी यथेष्ट रूप से प्राप्त था। तानसेन की माता पूर्ण साध्वी व कर्मनिष्ठ थीं। तानसेन का पालन-पोषण बड़े लाड़-प्यार से हुआ। एकमात्र संतान होने के कारण इनके माँ-बाप ने किसी प्रकार का कठोर नियंत्रण भी नहीं रखा।

मूल नाम

तानसेन का मूल नाम क्या था, यह निश्चय पूर्वक कहना कठिन है, किंवदंतियों के अनुसार उन्हें तन्ना, त्रिलोचन, तनसुख, अथवा रामतनु बतालाया जाता है। तानसेन इनाका नाम नहीं इनकी उपाधि थी, जो तानसेन को बांधवगढ़ के राजा रामचंद्र से प्राप्त हुई थी। वह उपाधि इतनी प्रसिद्ध हुई कि उसने इनके मूल नाम को ही लुप्त कर दिया। इनका जन्म-संवत् भी विवादग्रस्त है। हिन्दी साहित्य में इनके जन्म की संवत 1588 की प्रसिद्धि है किंतु कुछ विद्वानों ने संवत 1563 माना है।[3] तानसेन के मधुर कंठ और गायन शैली की ख्याति सुनकर 1562 ई. के लगभग अकबर ने उन्हें अपने दरबार में बुला लिया। अबुल फ़जल ने 'आइना-ए-अकबरी' में लिखा है कि अकबर ने जब पहली बार तानसेन का गाना सुना तो प्रसन्न होकर पुरस्कार में दो लाख टके दिए। तानसेन के कई पुत्र थे, और एक पुत्री थी। पुत्रों में तानतरंग ख़ाँ, सुरतिसेन और विलास ख़ाँ के नाम प्रसिद्ध हैं। उनके पुत्रों एवं शिष्यों के द्वारा "हिन्दुस्तानी संगीत" की बड़ी उन्नति हुई थी।

संगीत शिक्षा

तानसेन के आरंभिक काल में ग्वालियर पर कलाप्रिय राजा मानसिंह तोमर का शासन था। उनके प्रोत्साहन से ग्वालियर संगीत कला का विख्यात केन्द्र था, जहाँ पर बैजूबावरा, कर्ण और महमूद जैसे महान संगीताचार्य और गायक गण एकत्र थे, और इन्हीं के सहयोग से राजा मानसिंह तोमर ने संगीत की ध्रुपद गायकी का आविष्कार और प्रचार किया था। तानसेन को संगीत की शिक्षा ग्वालियर में वहाँ के कलाविद् राजा मानसिंह तोमर के किसी विख्यात संगीताचार्य से प्राप्त हुई थी। गौस मुहम्मद को उसका संगीत-गुरु बतलाना अप्रमाणित सिद्ध हो गया है। उस सूफी संत के प्रति इनकी श्रद्धा भावना रही हो, यह संभव जान पड़ता है।
ग्वालियर राज्य का पतन हो जाने पर वहाँ के संगीताचार्यों की मंडली बिखरने लगी थी। उस परिस्थिति में तानसेन को ग्वालियर में उच्च शिक्षा प्राप्त करना संभव ज्ञात नहीं हुआ। वह वृंदावन चले गए थे, जहाँ उसने संभवतः स्वामी हरिदास जी से संगीत की उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। वल्लभ संप्रदायी वार्ता के अनुसार तानसेन ने अपने उत्तर जीवन में अष्टछाप के संगीताचार्या गोविंदस्वामी से भी कीर्तन पद्धति का गायन सीखा था।[4]

रचनाएँ

नये रागों का आविष्कार

तानसेन ग्वालियर परंपरा की मूर्च्छना पद्धति के एवं ध्रुपद शैली के विख्यात गायक और कई रागों के विशेषज्ञ थे। इनको ब्रज की कीर्तन पद्धति का भी पर्याप्त ज्ञात था। साथ ही वह ईरानी संगीत की मुकाम पद्धति से भी परिचित थे। उन सब के समंवय से उसने अनेक नये रागों का आविष्कार किया था, जिनमें "मियाँ की मलार" अधिक प्रसिद्ध है। तानसेन के गायन की प्रशंसा में कई चमत्कारपूर्ण किंवदंतियाँ प्रचलित हैं, किंतु उनकी प्रामाणिकता संदिग्ध है।

ध्रुपदों की रचना

तानसेन गायक होने के साथ ही कवि भी थे। उसने अपने गान के लिए स्वयं बहुसंख्यक ध्रुपदों की रचना की थी। उनमें से अनेक ध्रुपद संगीत के विविध ग्रंथों में और कलावंतों के पुराने घरानों में सुरक्षित हैं। तानसेन के नाम से "संगीत-सार और "राग-माला" नामक दो ग्रंथ भी मिलते हैं[5]
ग्रंथ "संगीत-सम्राट तानसेन" में उसके रचे हुए 288 ध्रुपदों का संकलन है। ये ध्रुपद विविध विषयों से संबंधित हैं। इसके अतिरिक्त उनके ग्रंथ "संगतिदार" और "रागमाला" भी संकलित हैं। यहाँ पर तानसेन कृत "कृष्ण लीला" के कुछ ध्रुपद उदाहरणार्था प्रस्तुत हैं-
पलना-झूलन-
हमारे लला के सुरंग खिलौना, खेलत, खेलत कृष्ण कन्हैया।
अगर-चंदन कौ पलना बन्यौ है, हीरा-लाल-जवाहर जड़ैया॥
भँवरी-भँवरा, चट्टा-बट्टा, हंस-चकोर, अरू मोर-चिरैया॥
तानसेन प्रभु जसोमति झुलावै, दोऊ कर लेत बलैया।
गो-चारन-
धौरी-ध्रुमर, पीयरी-काजर कहि-कहि टेंरै।
मोर मुकट सीस, स्त्रवन कुंडल कटि में पीतांबर पहिरै॥ ग्वाल-बाल सब सखा संग के, लै आवत ब्रज नैरै।
"तानसेन" प्रभु मुख रज लपटानी जसुमति निरखि मुख है रै।
आजु हरि लियै अनहिली गैया, एक ही लकुटि सों हाँकी॥
ज्यों-ज्यों रोकी मोहन तुम सोई, त्यों-त्यों अनुराग हियं देखत मुखां की।
हम जो मनावत कहूँ तूम मानत, वे बतियाँ गढ़ि बॉकी॥
तृन नहीं चरत, बछरा नहीं चौखत की,
हम कहा जानै, को है कहाँ की।
तानसेन प्रभु वेगि दरस दीजै सब मंतर पढ़ि आँकी॥[6]
प्रथम उठ भोरही राधे-किशन कहो मन, जासों होवै सब सिद्ध काज।
इहि लोक परलोक के स्वामी, ध्यान धरौ ब्रजराज॥
पतित उद्धारन जन प्रतिपालन, दीनदयाल नाम लेत जाय दुख भाज।
"तानसेन" प्रभु कों सुमरों प्रातहिं, जग में रहै तेरी लाज॥
मुरली बजावै, आपन गावै, नैन न्यारे नंचावै, तियन के मन कों रिझावै।
दूर-दूर आवै पनघट, काहु के धटन दुरावै, रसना प्रेम जनावै॥
मोहिनी मूरत, सांवती सूरत, देखत ही मन ललचावै।
"तानसेन" के प्रभु तुम बहुनायक, सबहिंन के मन भावै॥

चमत्कारी घटनाएँ

यह कहा जाता है कि तानसेन के जीवन में पानी बरसाने, जंगली पशुओं को मंत्र- मुग्ध करने तथा रोगियों को ठीक करने आदि की अनेक संगीत-प्रधान चमत्कारी घटनाएँ हुईं। यह निर्विवाद सत्य है कि गुरु-कृपा से उन्हें बहुत-सी राग-रागनियाँ सिद्ध थीं। और उस समय देश में तानसेन जैसा दूसरा कोई संगीतज्ञ नहीं था। तानसेन ने व्यक्तिगत रूप से कई रागों का निर्माण भी किया, जिनमें दरबारी कान्हड़ा, मियाँ की सारंग मियाँमल्लार आदि उल्लेखनीय हैं।

 
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संगीत थेरेपी

संगीत थेरेपी दोनों एक मित्र राष्ट्रों स्वास्थ्य पेशे और वैज्ञानिक अनुसंधान जो प्रक्रिया के नैदानिक चिकित्सा और biomusicology, संगीत ध्वनिकी, संगीत सिद्धांत, psychoacoustics और तुलनात्मक संगीत की विद्या के बीच correlations के अध्ययन के एक क्षेत्र है।
यह एक पारस्परिक प्रक्रिया संगीत और इसकी पहलुओं के सभी में एक प्रशिक्षित संगीत चिकित्सक का उपयोग करता है-शारीरिक, भावनात्मक, मानसिक, सामाजिक, सौंदर्य और आध्यात्मिक-ग्राहकों को बेहतर बनाने के लिए या उनके स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद करने के लिए।
संगीत चिकित्सक मुख्य रूप से ग्राहकों के संगीत अनुभव (उदाहरण के लिए, गायन, songwriting, सुन और संगीत, संगीत में जाने पर चर्चा) का उपयोग करते हुए उनके कामकाज और आत्म में जीवन की गुणवत्ता (उदाहरण के लिए, संज्ञानात्मक कार्य, मोटर कौशल, भावनात्मक और भावात्मक विकास, व्यवहार और सामाजिक कौशल) विभिन्न डोमेन के नमूदार स्तर में सुधार मदद मध्यम श्रेणी का इलाज लक्ष्यों और उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए।
रेफरल संगीत चिकित्सा सेवाओं के लिए एक चिकित्सक के उपचार या ऐसे चिकित्सकों, मनोवैज्ञानिक, भौतिक चिकित्सक और व्यावसायिक चिकित्सक के रूप में चिकित्सकों के निर्वाचकगण के एक अंतःविषय टीम द्वारा किया जा सकता है।
संगीत चिकित्सक व्यवसायों की मदद के लगभग हर क्षेत्र में पाया जाता है। कुछ अधिक पाया प्रथाओं विकासात्मक कार्य (संचार, मोटर कौशल, आदि) विशेष आवश्यकताओं, songwriting और बुजुर्ग, प्रसंस्करण और छूट के काम, और लयबद्ध entrainment स्ट्रोक के शिकार में भौतिक पुनर्वास के लिए के साथ संस्मरण/अभिविन्यास के काम में सुनने के साथ व्यक्तियों के साथ शामिल हैं।
द्वारा Turco-फारसी मनोवैज्ञानिक और संगीत सिद्घांतकार अल-यूरोप में, "Alpharabius" के रूप में जाना जाता फराबी (872–950), अपने ग्रंथ ' अर्थ की बुद्धि ', में संगीत थेरेपी के साथ जहां वह आत्मा पर संगीत के उपचारात्मक प्रभाव पर चर्चा की निपटा।
रॉबर्ट बर्टन अपने क्लासिक काम में, ' शरीर रचना विज्ञान की उदासी ', 17 वीं सदी में लिखा था कि संगीत और नृत्य मानसिक बीमारी, विशेष रूप से झक के उपचार में महत्वपूर्ण थे।
यह अभिव्यंजक उपचार में से एक माना जाता है।
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संगीत और प्रकृति

संगीत और प्रकृति
-हेम सिंह
सृष्टि के प्रारम्भ से संगीत हमारे जीवन का अभिन्न अंग रहा है | अगर देखा जाये तो प्रकृति का प्रत्येक तत्व संगीतमय है| कलकल करती नदियां हो या फिर सन्तूर की तान छोड़ते झरने, हवा के संग संग मद मस्त झूमते बाग वन हो या फूलों की खुसबू से मदहोश भवरें और तितलियां, ये सभी संगीत की स्वछंद स्फ्रुतिट स्वर लहरियों पर इतराते नजर आते है| कुछ वैज्ञानिको ने तो यहाँ तक कहा है कि संगीत ही वो विधा है जो हमारे मन मस्तिष्क पर सीधा असर डालती है| संगीत की अब तक की यात्रा पर दृष्टिपात करने से ये बात पूणतः सत्य लगती है|
हमारे यहाँ शास्त्रीय रागों का निर्धारण भी प्रकृति के विविध रंगों के अनुरूप ही किया गया है| प्रभात बेला पर गाये जाने वाले राग अलग हैं और संध्या बेला व रात्रि में गाये जाने वाले राग अलग| महान् संगीतज्ञों द्वारा किया गया रागों का निर्धारण जिस समय के लिय निर्धारित है उससे विपरीत राग को गाने या बजाने पर वो अनुभूति नहीं होती जो उसके निर्धारित काल या समय में मिलती है| इससे स्पष्ट हो जाता है कि संगीत कि प्रकृति प्रकृति से अनुप्राणित है|
संगीत न केवल हमारी जीवन शैली है बल्कि हमारी सम्पूर्ण शक्ति का अनुपम स्रोत भी है| हमारा सम्पूर्ण आध्यात्म किसी न किसी रूप में संगीत पर ही आधारित है| संगीत में अदभुत शक्ति है इसमें अमरत्व सा चमत्कार है| संगीत कि महत्ता को दर्शाते हुये महापुरुषों ने भी कुछ येसा ही कहा है| सादी के अनुसार संगीत क पीछे पीछे खुदा चलता है| जबकि महात्मा गाँधी का कथन है कि मधुर संगीत आत्मा के ताप मन को शान्त कर देता है| प्रसिद्ध विद्वान लांगफेलो का मानना है कि संगीत मानव की विश्व व्यापी भाषा है| यानि संगीत की कोई एक भाषा नहीं, कोई सीमा नहीं| वो हमारी प्रकृति की तरह ही सब पर सामान दृष्टि रखता है| व्यक्ति की आत्मा से निकलता है और आत्मा से जुड़ता है|
संगीत की सहजता, सरलता और उसकी अपार शक्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हमारे यहाँ देवी-देवता भी बिना, मुरली, डमरू तथा वीणा के पुरे नहीं समझे गए हैं, मानव का तो प्रशन ही क्या है | संगीत मानव को ही नहीं अपितु अन्य प्राणियों को भी अपने वश में करने की विशेषता रखता है | संगीत मन को एकाग्र करने में भी बड़ा सहायक शिद्ध होता है | संगीत के माध्यम से आप अपने ईष्ट में बड़ी जल्दी और सुगमता से तन्मय हो सकते है | योगी जन जीवात्मा और परब्रम्ह में की जिस एकता के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन सुखा देता है वह संगीत के माध्यम से सहज ही प्राप्त हो जाता है| क्या जड़ और क्या चेतन संगीत सब पर अपना समान अधिकार रखता है | संगीत की विशेताओं का वर्णन करते हुए कारलाइन ने एक स्थान पर लिखा है कि Music is well said to be speech of angels अर्थात् संगीत को फरिश्तों कि भाषा ठीक ही कहा गया है|
संगीत को एक दैवी कल्पना माना गया है| सामदेव से लेकर आज तक चली आ रही भारतीय संगीत कि अक्षुण्य परंपरा को विश्व मे प्राचीनतम कहा गया है| इसने जाती और धर्म के बंधनों को तोडा है और शायद संगीत हमारे देश की सांस्कृतिक एकता की मजबूत कड़ी रही है| स्वामी हरिदास, अमीर खुसरो जैसे महान संगीतकारों के संगीत साधना पर दृष्टिपात करने से ये स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है कि भारितीय शास्त्रीय संगीत प्रारंभ से किसी न किसी रूप में प्रकृति अथवा आध्यात्म से ही जुड़ा है और शायद इसीलिय भारितीय शास्त्रीय संगीत आज भी हमारी आत्मा को गहराई से झंकृत करता है|
ऐसी मान्यता है कि तानसेन जैसे सिद्धहस्त संगीतज्ञ अपनी गायकी से प्रकृति के नियमो को भी बदल देते थे जैसे मेघ मल्हार गाकर बारिश करा देना, बिना किसी अग्नि के दीपक जला देना आदि| वैज्ञानिक तर्कों पर इसे आजमाने पर ये बात सामने आती है कि वास्तव में मेघ मल्हार गाने से बारिश नहीं होती थी बल्कि बारिश जैसी अनुभूति होती थी| यदि इस बात को ही सत्य माना जाए तो भी ये अपने में किसी चमत्कार से कम नहीं और ये चमत्कार संगीत और प्रकृति कि साम्यता का ही परिणाम है हाल के वर्षों में संगीत में बहुत सारे प्रयोग हुए हैं इन प्रयोगों में ये बात मुखरित हुई है कि संगीत ही एक मात्र ऐसा माध्यम है जो पृथ्वी पर रहने वाले लगभग प्रत्येक प्राणी को अपने वश में कर सकता है| आज तो संगीत से बीमारिओं का इलाज भी किया जा रहा है| मेरे हिसाब से संगीत एक शास्त्र है, जो बिना योग और कठिन साधना के सिद्ध नहीं हो पाता| जो इसको सिद्ध कर लेता है उससे प्रकृति भी सिद्ध हो जाती है| क्योंकि सच्चा संगीत प्रकृति के विभिन्न रंगों और नियमों से ही प्ररित है फिर वो संगीत चाहे लोक हो अथवा शास्त्रीय|
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दर्द से ध्यान हटा सकता है पसंदीदा संगीत .

दर्द से ध्यान हटा सकता है पसंदीदा संगीत .

दर्द से ध्यान हटा सकता है पसंदीदा संगीत .
(म्यूजिक कैन टेक अवे पैन /MUSIC CAN TAKE AWAY PAIN /YOU /MUMBAI MIRROR /DEC 24,2011P29).
जिन लोगों की बे -चैनी दिन रात बनी रहती है एन्ग्जायती लेविल उच्चतर बना रहता है तथा जिनका ध्यान बोध सम्बन्धी (संज्ञानात्मक कामों )में ज्यादा रमता है संगीत उनके लिए एक बेहतरीन दर्द -हारी (ANALGESIC ) )का काम कर सकता है .
कृत्रिम दर्द उद्दीपनों के प्रति होने वाली अनुक्रिया को रेस्पोंस को भटका सकता है पसंदीदा संगीत .दर्द के केन्द्रों की तरफ बढ़ने से भटका सकता है .यही कहना है University of Utah Pain Research centre के साइंसदानों का .
अपने अध्ययन के दौरान उन्होंने बतलाया है ,संगीत व्यक्ति का ध्यान दर्द से विमुख कर सकता है .संज्ञानात्मक केंद्र से बाहर खदेड़ सकता है दर्द के केंद्र बिंदु को एहसास को .
इस अध्ययन का केन्द्रीय बिंदु है मरीज़ का ध्यान दर्द से हटाना .यही दर्द के विनियमन का कामयाब ज़रिया बन सकता है एक दिन .
अध्ययन में १४३ प्रतिभागियों का जायजा लिया गया है .
उन्हें संगीत के ट्रेक्स सुनवाए गए ,उनके माधुर्य पर ध्यान लगाने को तथा संभावित विचलन वेरिएशन का पता लगाने के लिए कहा गया .
इसी दरमियान उन्हें फिंगर टिप्स इलेक्ट्रोडों के ज़रिये सह सकने लायक सुरक्षित experimental pain shocks भी दिए गए .पता चला दर्द की लहर खासी कम हो गई थी संगीत की स्वर लहरी माधुरी के असर से . दर्द का उद्दीपन माधुर्य और सुने गए संगीत की मात्रा के अनुरूप ही कमतर होता गया .
Central arousal from the pain stimuli reliably decreased with the increasing music task demand .
संगीत दर्द के एहसास को कमतर कर देता है .यह इन्द्रिय बोध सम्बन्धी रास्तों को सक्रीय करके एक तरफ संवेगात्मक अनुक्रियाओं को बढा देता है जो दर्द के रास्तों से मुकाबला करके दर्द की लहर को दर्द का एहसास करने वाले हिस्सों तक पहुँचने से रोक देती है .दूसरी तरफ मन को संगीत लहरी में ही रमा देता है .संगीत इस तरह एक प्रकार का बोध और संवेगात्मक सम्बन्धी मानसिक अनुबंध है . जो दर्द के एहसास को घटाता है .यह अध्ययन जर्नल ऑफ़ पैन में प्रकाशित हुआ है .
back link-http://veerubhai1947.blogspot.in/2011/12/blog-post_24.html
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संगीत एक ध्यान

ध्यान-विधि
संगीत एक ध्यान
संगीत को सुनते हुए सजग हो कर उसमें प्रवेश करो और उसके मेरुदंड को खोजो-उस केंद्रीय स्वर को खोजो जो पूरे संगीत को सम्हाले हुए रहता है
शिव ने कहाः तारवाले वाद्यों की ध्वनि सुनते हुए उसकी संयुक्त केंन्द्रीय ध्वनि को सुनो; इस प्रकार सर्वव्यापकता को उपलब्ध होओ।
तुम किसी वाद्य को सुन रहे हो, सितार या किसी वाद्य को। उसमें कई स्वर हैं। सजग हो कर उसके केंद्रीय स्वर को सुनों-उस स्वर को उसका मेरूदंड हो और जिसके चारों ओर और सभी स्वर घूमतें हो; उसकी गहनतम धारा को सुनो जो अन्य सभी स्वरों को सम्हाले हुई जैसे तुम्हारे पूरे शरीर को उसका मेरुदंड, उसकी रीढ़ सम्हाले हुई है, वैस ही संगीत की भी रीढ़ होती है।
संगीत को सुनते हुए सजग हो कर उसमें प्रवेश करो और उसके मेरुदंड को खोजो - उस केंद्रीय स्वर को खोजो जो पूरे संगीत को सम्हाले हुए रहता है। स्वर तो आते-जाते और विलीन होते रहते हैं, लेकिन केंद्रीय तत्व प्रवाहमान रहता है।
उसके प्रति जागरूक होओ।
बुनियादी रूप में, मूलतः संगीत का उपयोग ध्यान के लिए किया जाता था। भारतीय संगीत का विकास तो विशेष रूप से ध्यान की विधि के रूप में ही हुआ। वैसे ही भारतीय नृत्य का विकास भी ध्यान-विधि की तरह हुआ। संगीतज्ञ या नर्तक के लिए ही नहीं, श्रोता या दर्शक के लिए भी वे गहरे ध्यान के उपाय थे।
नर्तक या संगीतज्ञ मात्र एक यंत्रविशेषज्ञ, एक टेक्नीशियन भी हो सकता है। यदि उसका नृत्य या संगीत में ध्यान नहीं है तो वह टेक्नीशियन ही है। वह बड़ा टेक्नीशियन हो सकता है; लेकिन तब उसके संगीत में आत्मा नहीं है, शरीर भर है। आत्मा तो तब होती है जब संगीतज्ञ गहरा ध्यानी भी हो।
संगीत तो बाहरी चीज है। लेकिन सितार बजाते हुए वादक केवल सितार ही नहीं बजाता है। वह भीतर अपने बोध को भी जगा रहा है। बाहर सितार बजता है और उसका सघन होश भीतर गति करता है। संगीत बाहर बहता रहता है, लेकिन वह संगीत के अंतरस्थ केंद्र के प्रति सदा सजग बना रहता है। वह समाधि लाता है। वह आनंद लाता है। वह शिखर बन जाता है...
लेकिन जब तुम संगीत सुनते हो तो क्या करते हो? तुम ध्यान नहीं करते हो; उलटे तुम संगीत का शराब की तरह उपयोग करते हो। तुम हलके होने के लिए संगीत का उपयोग करते हो; तुम आत्म-विस्मरण के लिए संगीत का उपयोग करते हो।
यही दुर्भाग्य है, यही पीढ़ा है कि जो विधियां जागरूकता के लिए विकसित की गई थीं, उनका उपयोग नींद के लिए किया जा रहा है! और यह एक उदाहरण है कि आदमी कैसे अपने साथ दुष्टता और अनिष्ट किये जा रहा है...

यह सूत्र कहता है कि ''तारवाले वाद्यों की ध्वनि को सुनते हुए, उसकी संयुक्त केंद्रीय ध्वनि को सुनो; इस प्रकार सर्वव्यापकता को उपलब्ध होओ।'' और तब तुम उसे जान लोगे, जो जानने योग्य है। तब तुम सर्वव्यापक हो जाओगे। उस संगीत के साथ, उसके सामासिक केंद्रीय मर्म को प्राप्त कर तुम जाग जाओगे और उस जागरण के साथ तुम सर्वव्यापी हो जाओगे।
अभी तो तुम कहीं एक जगह हो; उस बिंदु को हम अहंकार कहते हैं। अभी तुम उसी बिंदु पर हो। यदि तुम जाग जाओगे तो यह बिंदु विलीन हो जाएगा। तब तुम कहीं एक जगह नहीं होओगे। तुम सागर हो जाओगे। तुम अनंत हो जाओगे।
मन के साथ सीमा है और ध्यान के साथ अनंत प्रवेश करता है।
-ओशो
ध्यानयोग: प्रथम और अंतिम मुक्ति
http://www.oshoworld.com/onlinemaghindi/august12/htm/Dhyan_Vidhi.asp
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