प्रेम जीवन का विशुद्ध रस । प्रेम माधुरी जी का सान्निध्य जंहा अमृत के प्याले पिलाए जाते है ।प्रेम माधुर्य वेबसाइट से हमारा प्रयास है कि इस से एक संवेदना जागृत हो ।

Thursday, May 31

लाडली अद्भुत नजारा तेरे बरसाने में है


लाडली अद्भुत नजारा तेरे बरसाने में है ..
लाडली अब मन हमारा तेरे बरसाने में है
बेसहारो को सहारा तेरे बरसाने में है ..

लाडली अद्भुत नजारा तेरे बरसाने में है ..
राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे श्री राधे 

राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे श्री राधे
राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे श्री

 राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे श्री राधे

झांकिया तेरे महल की कर रहे सब देव गण..
आ गया बैकुंठ द्वारा ..तेरे बरसाने में है
 राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे श्री राधे

हर लता  हर डाल पर तेरी दया की एक नजर ..
हर घडी यशुमति दुलारा..तेरे बरसाने में है
राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे श्री राधे

अब कहाँ  जाऊ  किशोरी तेरे दर को छोड़ कर..
मेरे जीवन का सहारा..तेरे बरसाने में है
राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे श्री राधे

मै भला हु  या बुरा हु पर तुम्हारा हु सदा..
अब तो जीवन का किनारा ..तेरे बरसाने में है
राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे श्री राधे
राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे श्री राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे श्री राधे
राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे श्री राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे श्री राधे
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Saturday, May 12

मेरी माँ





जब आंख खुली तो अम्मा की गोदी का एक सहारा था...
उसका नन्हा सा अंचल मुझ को भूमंडल से प्यारा था...
उसके चहरे की झलक देख चेहरा फूलो सा खिलता था...
उसके अंचल की एक बूंद से मुझे को जीवन मिलता था....
हाथो से बालो को नोचा...पैरो से खूब प्रहार किया...
फिर भी उस माँ ने पुचकारा हमें जी भर के प्यार किया...
"मै उसका रजा बेटा था..आंख का तारा कहती थी..
मै बनू बुडापे में उसका एक सहारा कहती थी...


उंगली को पकड़ चलाया था पढ़ने विद्यालय भेजा था...
मेरी नादानी को भी निज अंर्तमन में सदा सहेजा था...
मेरे सरे प्रशनो का वो फौरन जवाब बन जाती थी..
मेरे राह के कांटे चुग खुद गुलाब बन जाती थी....
माँ हंसती है तो धरती का जर्रा जर्रा मुस्काता है...
मन मेरे घर के दीवारों में चंदा की सूरत है...
पर मन के इस मंदिर में माँ की मूरत है ...
माँ सरस्वती..लक्ष्मी देवी..अनुसूया सीता है.....
माँ पावनता में राम चरित मानस..भगवत गीता है...
अम्मा मुझे तेरी हर बात वरदान से बड़ कर लगती है...
हे माँ मुझे तेरी सूरत भगवन से बड़ कर लगती है...
सारे तीर्थ के पुण्य जंहा मै उन चरणों में लेटा हूँ...
जिन के कोई संतान नही मै उन माओ का बेटा हूँ....
हर घर में माँ की पूजा हो ऐसा संकल्प उठाता हूँ ...
दुनिया की हर माँ की चरणों में ये शीश झुकाता हूँ..
यह बात तब कि है जब भगवान को दिन-रात कायनात का निर्माण करते हुए छठा दिन था और वो "मां" का निर्माण कर रहे थे। जब वे अपने काम में तल्लीन थे, तभी उनके सामने एक देवदूत आ खड़ा हुआ और उसने उनसे पूछा, "आप इस कृति को बनाने में इतना वक्त क्यों लगा रहे हैं?"  तब भगवान ने जवाब दिया, "दरअसल मुझे मेरी इस रचना को अनेक विलक्षणताओं के साथ बनाना है। जैसे, इसे सदैव निर्मल रहना है, साथ ही इसके अंग-अंग से सजीवता झलकनी चाहिए। इसके शरीर में 200 गतिमान हिस्से हैं। यह एक रचना होगी, जो थोड़ी सी चाय-कॉफी और बचे हुए खाने के सहारे भी जीवित रह सकेगी।"  "इसकी गोद इतनी विशाल होगी कि जिसमें तीन शिशु एक साथ आ सकें...। जिसके एक चुंबन से छिले हुए घुटने से लेकर टूटे हुए दिल तक , यानी सब कुछ ठीक हो जाएगा। इसे मैं छह हाथ भी देने जा रहा हूं।"  इन विलक्षण विशिष्टताओं को सुनकर दंग देवदूत बोला, "क्या आप इसे छह हाथ देने जा रहे हैं, पर इसकी क्या आवश्यकता?"  भगवान ने जवाब दिया, "अरे. असल समस्या ये छह हाथ नहीं हैं, मैं तो तीन जोड़ी आंखों को लेकर चिंतित हूं जो हर मां के पास होनी ही चाहिएं।" देवदूत ने कहा, "और तीन जोड़ी आंखें होने पर ही मां का मानक मॉडल तैयार होगा?"  भगवान ने हां में सिर हिलाया और बोले, "तुम बिल्कुल ठीक समझ रहे हो। एक जोड़ी आंखें बंद दरवाजे से भी झांकने में सक्षम होंगी, ताकि वह अपने बच्चों से पूछ सके कि वे क्या कर रहे हैं, जबकि वह अपनी इन आंखों के कारण पहले ही जानती होगी कि उसके बच्चे क्या कर रहे हैं।"  "आंखों की दूसरी जोड़ी सिर के पीछे होगी, ताकि वह हर उस बात को जान सके जिसे उसको जानने की जरूरत है और लोग सोच भी न सकें कि इसकी जानकारी उसे हो भी सकती है।"  "और तीसरी जोड़ी आंखें उसके माथे पर होंगी ताकि वह राह से भटके अपने बच्चों पर नजर रख सके और बगैर एक शब्द कहे अपने बच्चों से कह सके कि वह उनसे कितना प्यार करती है।"  अब देवदूत ने भगवान को रोकने की कोशिश की, "भगवान, आपने आज दिन भर में काफी काम कर लिया है। आप काम खत्म करने के लिए कल का इंतजार भी तो कर सकते हैं।"   भगवान ने प्रतिरोध किया, बोले, "नहीं, मैं नहीं कर सकता। मैं अपनी इस कृति को पूरा करने के बहुत करीब हूं जो मेरे दिल के काफी करीब है। यह एक ऎसी कृति है, जब वो बीमार होगी तो अपना इलाज और देखभाल खुद करेगी। जिसे बहुत कम संसाधनों में छह लोगों का पेट पालना आता होगा।" अब देवदूत भगवान के करीब आ गया और उसने उस औरत को छुआ, चौंककर बोला, "लेकिन भगवान आपने तो इसे बहुत ही कोमल बनाया है।"  भगवान सहमत होते हुए बोले, "हां, यह बहुत ही कोमल है, लेकिन मैंने इसे बहुत कठोर भी बनाया है। तुम्हें अंदाजा भी नहीं है कि यह क्या-क्या सहन कर सकती है और क्या-क्या काम कर सकती है।" "तो क्या यह सोच भी सकेगी?" देवदूत ने पूछा।  अब भगवान ने जवाब दिया, "यह न केवल सोच सकेगी, बल्कि तर्क दे सकेगी, समस्याओं को सुलझा सकेगी।"  तभी देवदूत ने कुछ नोटिस किया। वह भगवान की उस कृति तक पहुंचा और उसने उसके गालों को छुआ और तुरंत बोला, "अरे भगवान, ऎसा लगता है कि आपने इस रचना में एक कमी छोड़ दी है। मैंने कहा था न कि आप इस कृति को ज्यादा ही विलक्षणताएं प्रदान करने का प्रयास कर रहे हैं।" भगवान ने प्रतिरोध किया, "नहीं, यह कोई कमी नहीं है। ये आंसू हैं।"  "ये आंसू किस लिए?" देवदूत ने पूछा। भगवान ने जवाब दिया, "ये आंसू इसका अपनी खुशी, अपना दुख, अपनी निराशा, अपने दर्द, अपने अकेलेपन और यह तक कि अपने गर्व को भी जताने का तरीका होगा।" अब देवदूत काफी प्रभावित था और वह बोला..."भगवान आप महान् हैं, आपने मां को सब कुछ सोचकर बनाया है। आपकी यह कृति सर्वोत्तम है।"  इरमा बॉमबैक
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Saturday, April 21

जगन्नाथ रथयात्रा


उड़ीसा प्रान्त में भुवनेश्वर से कुछ दूरी पर स्थित समुद्र के किनारे भगवान जगन्नाथ का यह मन्दिर अपनी भव्य एवं मनोहारी सुन्दरता के कारण धर्म और आस्था का केन्द्र माना जाता है। भारत में मनाए जाने वाले महोत्सवों में जगन्नाथपुरी की रथयात्रा सबसे महत्त्वपूर्ण है। यह परंपरागत रथयात्रा केवल भारत में ही नहीं, विदेशी पर्यटकों के भी आकर्षण का केंद्र है। श्रीकृष्ण के अवतार जगन्नाथ की रथयात्रा का पुण्य सौ यज्ञों के समकक्ष माना जाता है। सागर तट पर बसे पुरी शहर में होने वाले 'जगन्नाथ रथयात्रा उत्सव' के समय आस्था का जो विराट वैभव देखने को मिलता है, वह और कहीं दुर्लभ है। देश-विदेश से लाखों लोग इस पर्व के साक्षी बनने हर वर्ष यहाँ आते हैं। देश के चार पवित्र धामों में एक पुरी के 800 वर्ष पुराने मुख्य मंदिर में योगेश्वर श्रीकृष्ण जगन्नाथ के रूप में विराजते हैं। साथ ही यहाँ बलभद्र एवं सुभद्रा भी हैं। दर्शन वर्तमान रथयात्रा में जगन्नाथ को दशावतारों के रूप में पूजा जाता है, उनमें विष्णु, कृष्ण और वामन और बुद्ध हैं। जगन्नाथ मंदिर में पूजा, आचार-व्यवहार, रीति-नीति और व्यवस्थाओं को शैव, वैष्णव, बौद्ध, जैन धर्मावलम्बियों ने भी प्रभावित किया है। रथ का रूप श्रद्धा के रस से परिपूर्ण होता है। वह चलते समय शब्द करता है। उसमें धूप और अगरबत्ती की सुगंध होती है। इसे भक्तजनों का पवित्र स्पर्श प्राप्त होता है। रथ का निर्माण बुद्धि, चित्त और अहंकार से होता है, ऐसे रथ रूपी शरीर में आत्मा रूपी भगवान जगन्नाथ विराजमान होते हैं। इस प्रकार रथयात्रा शरीर और आत्मा के मेल की ओर संकेत करता है और आत्मदृष्टि बनाए रखने की प्रेरणा देती है। रथयात्रा के समय रथ का संचालन आत्मा युक्त शरीर करता है जो जीवन यात्रा का प्रतीक है। यद्यपि शरीर में आत्मा होती है तो भी वह स्वयं संचालित नहीं होती, बल्कि उसे माया संचालित करती है। इसी प्रकार भगवान जगन्नाथ के विराजमान होने पर भी रथ स्वयं नहीं चलता बल्कि उसे खींचने के लिए लोक-शक्ति की आवश्यकता होती है। इतिहास पौराणिक कथाओं के अनुसार 'राजा इन्द्रद्युम्न' भगवान जगन्नाथ को 'शबर राजा' से यहां लेकर आये थे तथा उन्होंने ही मूल मंदिर का निर्माण कराया था जो बाद में नष्ट हो गया। इस मूल मंदिर का कब निर्माण हुआ और यह कब नष्ट हो गया इस बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं है। 'ययाति केशरी' ने भी एक मंदिर का निर्माण कराया था। वर्तमान 65 मीटर ऊंचे मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में चोल 'गंगदेव' तथा 'अनंग भीमदेव' ने कराया था। परंतु जगन्नाथ संप्रदाय वैदिक काल से लेकर अब तक मौजूद है। पुरी का मंदिर रथयात्रा के समय भक्तों को प्रतिमाओं तक पहुँचने का अवसर मिलता है। पुरी का जगन्नाथ मंदिर भक्तों की आस्था केंद्र है, जहाँ पूरे वर्ष भक्तों का मेला लगा रहता है। पुरी का जगन्नाथ मंदिर उच्चस्तरीय नक़्क़ाशी और भव्यता लिए प्रसिद्ध है। रथोत्सव के समय इसकी छटा निराली होती है। पुरी के महान मन्दिर में तीन मूर्तियाँ हैं - भगवान जगन्नाथ की मूर्ति, बलभद्र की मूर्ति, उनकी बहन सुभद्रा की की मूर्ति। ये सभी मूर्तियाँ काष्ठ की बनी हुई हैं। पुरी की ये तीनों प्रतिमाएँ भारत के सभी देवी – देवताओं की तरह नहीं होतीं। यह मूर्तियाँ आदिवासी मुखाकृति के साथ अधिक साम्यता रखती हैं। पुरी का मुख्य मंदिर बारहवीं सदी में राजा अनंतवर्मन के शासनकाल के समय बनाया गया। उसके बाद जगन्नाथ जी के 120 मंदिर बनाए गए हैं। विशाल मंदिर जगन्नाथ के विशाल मंदिर के भीतर चार खण्‍ड हैं - 1.प्रथम भोगमंदिर, जिसमें भगवान को भोग लगाया जाता है। 2.द्वितीय रंगमंदिर, जिसमें नृत्‍य-गान आदि होते हैं। 3.तृतीय सभामण्‍डप, जिसमें दर्शकगण (तीर्थ यात्री) बैठते हैं। 4.चौथा अंतराल है। जगन्‍नाथ के मंदिर का गुंबद 192 फुट ऊंचा और चवक्र तथा ध्‍वज से आच्‍छन्‍न है। मंदिर समुद्र तट से 7 फर्लांग दूर है। यह सतह से 20 फुट ऊंची एक छोटी सी पहाड़ी पर स्‍थित है। पहाड़ी गोलाकार है, जिसे 'नीलगिरि' कहकर सम्‍मानित किया जाता है। अन्‍तराल के प्रत्‍येक तरफ एक बड़ा द्वार है, उनमें पूर्व का द्वार सबसे बड़ा और भव्‍य है। प्रवेश द्वार पर एक 'बृहत्‍काय सिंह' है, इसीलिए इस द्वार को 'सिंह द्वार' भी कहा जाता है। यह मंदिर 20 फीट ऊंची दीवार के परकोटे के भीतर है जिसमें अनेक छोटे-छोटे मंदिर है। मुख्य मंदिर के अलावा एक परंपरागत डयोढ़ी, पवित्र देवस्थान या गर्भगृह, प्रार्थना करने का हॉल और स्तंभों वाला एक नृत्य हॉल है। सदियों से पुरी को अनेक नामों से जाना जाता है जैसे - नीलगिरि, नीलाद्री, नीलाचंल, पुरुषोत्तम, शंखक्षेत्र, श्रीक्षेत्र, जगन्नाथ धाम और जगन्नाथ पुरी। यहां पर बारह महत्त्वपूर्ण त्यौहार मनाये जाते हैं, लेकिन इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण त्यौहार जिसने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की है, वह रथयात्रा ही है। दस दिवसीय महोत्सव पुरी का जगन्नाथ मंदिर के दस दिवसीय महोत्सव की तैयारी का श्रीगणेश अक्षय तृतीया को श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों के निर्माण से हो जाता है। कुछ धार्मिक अनुष्ठान भी किए जाते हैं। गरुड़ध्वज जगन्नाथ जी का रथ 'गरुड़ध्वज' या 'कपिलध्वज' कहलाता है। 16 पहियों वाला यह रथ 13.5 मीटर ऊँचा होता है जिसमें लाल व पीले रंग के वस्त्र का प्रयोग होता है। विष्णु का वाहक गरु़ड़ इसकी रक्षा करता है। रथ पर जो ध्वज है, उसे 'त्रैलोक्यमोहिनी' या ‘नंदीघोष’ रथ कहते हैं। तालध्वज बलराम का रथ 'तलध्वज' के नाम से पहचाना जाता है। यह रथ 13.2 मीटर ऊँचा 14 पहियों का होता है। यह लाल, हरे रंग के कप़ड़े व लक़ड़ी के 763 टुक़ड़ों से बना होता है। रथ के रक्षक वासुदेव और सारथी मताली होते हैं। रथ के ध्वज को 'उनानी' कहते हैं। 'त्रिब्रा', ;घोरा', 'दीर्घशर्मा' व 'स्वर्णनावा' इसके अश्व हैं। जिस रस्सी से रथ खींचा जाता है, वह 'वासुकी' कहलाता है। पद्मध्वज या दर्पदलन सुभद्रा का रथ 'पद्मध्वज' कहलाता है। 12.9 मीटर ऊँचे 12 पहिए के इस रथ में लाल, काले कप़ड़े के साथ लकड़ी के 593 टुकड़ों का प्रयोग होता है। रथ की रक्षक 'जयदुर्गा' व सारथी 'अर्जुन' होते हैं। रथध्वज 'नदंबिक' कहलाता है। 'रोचिक', 'मोचिक', 'जिता' व 'अपराजिता' इसके अश्व होते हैं। इसे खींचने वाली रस्सी को 'स्वर्णचूडा' कहते हैं। दसवें दिन इस यात्रा का समापन हो जाता है। जगन्नाथ जी की रथयात्रा में श्रीकृष्ण के साथ राधा या रुक्मिणी के स्थान पर बलराम और सुभद्रा होते हैं। इस सम्बंध में कथा इस प्रकार है - एक बार द्वारिका में श्रीकृष्ण रुक्मिणी आदि राजमहिषियों के साथ शयन करते हुए निद्रा में राधे-राधे बोल पड़े। महारानियों को आश्चर्य हुआ। सुबह जागने पर श्रीकृष्ण ने अपना मनोभाव प्रकट नहीं किया। रुक्मिणी ने रानियों से बात की कि वृंदावन में राधा नाम की गोपकुमारी है जिसको प्रभु हम सबकी इतनी सेवा, निष्ठा और भक्ति के बाद भी नहीं भूल पाये है। राधा की श्रीकृष्ण के साथ रासलीलाओं के विषय में माता रोहिणी को ज्ञान होगा। अत: उनसे सभी महारानियों ने अनुनय-विनय की, कि वह इस विषय में बतायें। पहले तो माता रोहिणी ने इंकार किया किंतु महारानियों के अति आग्रह पर उन्होंने कहा कि ठीक है, पहले सुभद्रा को पहरे पर बिठा दो, कोई भी अंदर न आ पाए, चाहे वह बलराम या श्रीकृष्ण ही क्यों न हों। माता रोहिणी ने जैसे ही कथा कहना शुरू किया, अचानक श्रीकृष्ण और बलराम महल की ओर आते हुए दिखाई दिए। सुभद्रा ने उन्हें द्वार पर ही रोक लिया, किंतु श्रीकृष्ण और राधा की रासलीला की कथा श्रीकृष्ण और बलराम दोनो को ही सुनाई दी। उसको सुनकर श्रीकृष्ण और बलराम अद्भुत प्रेमरस का अनुभव करने लगे, सुभद्रा भी भावविह्वल हो गयी। अचानक नारद के आने से वे पूर्ववत हो गए। नारद ने श्री भगवान से प्रार्थना की कि - 'हे प्रभु आपके जिस 'महाभाव' में लीन मूर्तिस्थ रूप के मैंने दर्शन किए हैं, वह सामान्यजन के हेतु पृथ्वी पर सदैव सुशोभित रहे। प्रभु ने तथास्तु कहा।
रथ का निर्माण 

भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के लिए रथों का निर्माण लकड़ियों से होता है। इसमें कोई भी कील या काँटा, किसी भी धातु का नहीं लगाया जाता। यह एक धार्मिक कार्य है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता रहा है। रथों का निर्माण अक्षय तृतीया से 'वनजगा' महोत्सव से प्रारम्भ होता है तथा लकड़ियाँ चुनने का कार्य इसके पूर्व बसन्त पंचमी से शुरू हो जाता है। पुराने रथों की लकड़ियाँ भक्तजन श्रद्धापूर्वक ख़रीद लेते हैं और अपने–अपने घरों की खिड़कियाँ, दरवाज़े आदि बनवाने में इनका उपयोग करते हैं।

जगन्नाथ मंदिर पुरी महाप्रसाद

मन्दिर की रसोई में एक विशेष कक्ष रखा जाता है, जहाँ पर महाप्रसाद तैयार किया जाता है। इस महाप्रसाद में अरहर की दाल, चावल, साग, दही व खीर जैसे व्यंजन होते हैं। इसका एक भाग प्रभु का समर्पित करने के लिए रखा जाता है तथा इसे कदली पत्रों पर रखकर भक्तगणों को बहुत कम दाम में बेच दिया जाता है। जगन्नाथ मन्दिर को प्रेम से संसार का सबसे बड़ा होटल कहा जाता है। मन्दिर की रसोई में प्रतिदिन बहत्तर क्विंटल चावल पकाने का स्थान है। इतने चावल एक लाख लोगों के लिए पर्याप्त हैं। चार सौ रसोइए इस कार्य के लिए रखे जाते हैं। पुरी के जगन्नाथ मंदिर की एक विशेषता यह है कि मंदिर के बाहर स्थित रसोई में 25000 भक्त प्रसाद ग्रहण करते हैं। भगवान को नित्य पकाए हुए भोजन का भोग लगाया जाता है। परंतु रथयात्रा के दिन एक लाख चौदह हज़ार लोग रसोई कार्यक्रम में तथा अन्य व्यवस्था में लगे होते हैं। जबकि 6000 पुजारी पूजाविधि में कार्यरत होते हैं। उड़ीसा में दस दिनों तक चलने वाले एक राष्ट्रीय उत्सव में भाग लेने के लिए दुनिया के कोने-कोने से लोग उत्साहपूर्वक उमड़ पड़ते हैं। एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि रसोई में ब्राह्मण एक ही थाली में अन्य जाति के लोगों के साथ भोजन करते हैं, यहाँ जात-पाँत का कोई भेदभाव नहीं रखा जाता।

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Thursday, April 19

श्री राम जन्मोत्सव





भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी।।
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी।
भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी।।

कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता।
माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता।।
करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता।
सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता।।

ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै।
मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर पति थिर न रहै।।
उपजा जब ग्याना प्रभु मुसकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै।
कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै।।
माता पुनि बोली सो मति डौली तजहु तात यह रूपा।
कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा।।
सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा।
यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा।।

दिव्य श्रीराम मंदिर
It is good to keep a temple in your home; but make your house a temple.
हमारे घर में रह रही एक विभूति चाहे वह एक छोटा सा बालक हो या चाहे बुजुर्ग हो , सभी प्रभु श्रीराम ही है ।तो क्यों न हम घर को मंदिर बनाये,उसमे रह रहे सभी को लोगो को प्रभु अंश मानकर सभी से अच्छा व्यवहार करे । आज मंदिर बनाने की आवश्यकता नहीं है, आज हमारे घर को ही दिव्य मंदिर बनाने की जरुरत है । यह सच है कि समाज का निर्माण हम मनुष्य ही करते हैं। ठीक उसी तरह, यदि परिवार के सदस्य मिलकर एक निश्चित स्थान पर रहते हैं, तो घर का निर्माण होता है। यदि बारीक विश्लेषण किया जाए, तो हम पाएंगे कि हमारा घर एक मंदिर के समान होता है। वास्तव में, हम सभी ईश्वर का आशीर्वाद पाने के लिए मंदिर जाते हैं। हमारे घरों में भी ईश्वर के समान बडे-बुर्जुग होते हैं, जो हममें अच्छे संस्कार डालकर आशीर्वाद देते हैं। सच तो यह है कि घर भव्य भवन हो या झोपडा, उसमें व्यक्तित्व विकास का यज्ञ हमेशा चलता ही रहता है। इसलिए हमारा घर मंदिर के समान ही होता है। पहचान निर्धारित करता है घर | ध्यान रखें कि आप किसी ऊंचे पद पर हैं या अपना व्यवसाय चलाते हैं, हर स्थिति में आपकी भाषा-शैली से ही आपके घर के संस्कार झलकेंगे। यदि आप बातचीत के दौरान कटु भाषा का प्रयोग करते हैं, तो सामने वाला व्यक्ति इसके लिए आपको घर में दिए गए संस्कार को दोषी ठहरा सकता है। कहने का मतलब यही है कि आपकी पहचान घर ही निर्धारित करता है। इसलिए न केवल घर में, बल्कि घर के बाहर भी हमें मृदु-वाणी का प्रयोग करना चाहिए। यह संभव है कि हमें कभी-कभी परिस्थितिवश कठोर शब्दों का प्रयोग करना पडता है, लेकिन घर में प्रवेश करते ही हमें सावधान इसलिए भी हो जाना चाहिए, क्योंकि यहां उम्र में छोटे सदस्य भी रहते हैं, जिन पर हमारे आचार-व्यवहार का बुरा प्रभाव पडता है।
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Tuesday, April 3

दिव्य प्रेम~श्रीप्रेममाधुरी जी






श्रीप्रेम माधुरीजी नित्य सत्य एक मात्र अपने प्रियतम श्रीश्यामसुन्दर की सुख विधाता  है।वे इतनी त्यागमयी है , इतनी मधुर-स्वभावा है कि अचिंत्यानंत गुण-गन की अनंत हो कर भी अपने प्रियतम श्रीकृष्ण की अपेक्षा से सदा सर्व सद्गुण हीन  का अनुभव करती है । वे परिपूर्ण प्रेम प्रतिमा होने पर भी अपने में प्रेम का सर्वथा अभाव देखती है ।वे समस्त सौन्दर्य की एकमात्र निधि होने पर भी अपने को सौन्दर्य रहित मानती है और पवित्रतम सहज सरलता उनके स्वभाव की सहज वास्तु होने पर भी वे अपने में कुटिलता तथा दंभ के दर्शन करती और अपने को धिक्कार देती है ।वे अपनी एक अन्तरंग सखी से कहती है -
सखी री! हों  अवगुण की खान ।
तन गोरी, मन करी भरी,पातक पूरन प्रान ।।
नहीं त्याग रंचक मो मन में भर्यो अमित अभिमान ।
नहीं प्रेम कौ लेस, रहत नित निज सुख कौ ही ध्यान ।।
जग के दुःख-अभाव सतावे, हो मन पीड़ा-भान ।
तब तेहि दुःख दृग स्त्रवे अश्रु जल, नही कछु प्रेम-निदान ।।
तिन दुःख अंसुवन कौ दिखरावो हौं सूचि प्रेम महँ ।
करू कपट, हिय-भाव दुरावौ, रचौ स्वांग स-ज्ञान ।। 

जब श्यामसुंदर  उनके प्रति अपनी प्रेम-कृतज्ञता का एक शब्द  भी उच्चारण कर बैठते अथवा दिव्य प्रेम का पात्र बनाने में अपने सौभाग्य-सुख का तनिक सा संकेत भी कर जाते तो श्रीराधाजी अत्यंत संकोच में पड़कर लज्जा के मारे गड़ सी जाती । एक बार उन्होंने श्यामसुंदर से रोते रोते कहा-
तुम से सदा लिया ही मैंने, लेती-लेती थकी नही ।
अमित प्रेम-सौभाग्य मिला, पर मै कुछ भी दे सकी नहीं ।।
मेरी त्रुटी, मेरे दोषों को भी तुमने देखा नही  कभी ।
दिया सदा, देते न थके तुम. दे डाला निज प्यार सभी ।।
तब भी कहते-"दे न सका मै तुमको कुछ भी हे प्यारी ।
तुम-सी शीलगुणवती तुम ही, मै तुम पर बलिहारी "।
क्या मै कहू प्रान-प्रियतम से, देख लजाती अपनी ओर ।
मेरी हर करनी में ही तुम प्रेम देखते नंदकिशोर ।।
ऐसा दिव्य प्रेम है श्रीप्रेममाधुरी जी का ।





किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए किशोरीजी से क्षमा मांगते है ।
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