प्रेम जीवन का विशुद्ध रस । प्रेम माधुरी जी का सान्निध्य जंहा अमृत के प्याले पिलाए जाते है ।प्रेम माधुर्य वेबसाइट से हमारा प्रयास है कि इस से एक संवेदना जागृत हो ।

Saturday, April 21

जगन्नाथ रथयात्रा


उड़ीसा प्रान्त में भुवनेश्वर से कुछ दूरी पर स्थित समुद्र के किनारे भगवान जगन्नाथ का यह मन्दिर अपनी भव्य एवं मनोहारी सुन्दरता के कारण धर्म और आस्था का केन्द्र माना जाता है। भारत में मनाए जाने वाले महोत्सवों में जगन्नाथपुरी की रथयात्रा सबसे महत्त्वपूर्ण है। यह परंपरागत रथयात्रा केवल भारत में ही नहीं, विदेशी पर्यटकों के भी आकर्षण का केंद्र है। श्रीकृष्ण के अवतार जगन्नाथ की रथयात्रा का पुण्य सौ यज्ञों के समकक्ष माना जाता है। सागर तट पर बसे पुरी शहर में होने वाले 'जगन्नाथ रथयात्रा उत्सव' के समय आस्था का जो विराट वैभव देखने को मिलता है, वह और कहीं दुर्लभ है। देश-विदेश से लाखों लोग इस पर्व के साक्षी बनने हर वर्ष यहाँ आते हैं। देश के चार पवित्र धामों में एक पुरी के 800 वर्ष पुराने मुख्य मंदिर में योगेश्वर श्रीकृष्ण जगन्नाथ के रूप में विराजते हैं। साथ ही यहाँ बलभद्र एवं सुभद्रा भी हैं। दर्शन वर्तमान रथयात्रा में जगन्नाथ को दशावतारों के रूप में पूजा जाता है, उनमें विष्णु, कृष्ण और वामन और बुद्ध हैं। जगन्नाथ मंदिर में पूजा, आचार-व्यवहार, रीति-नीति और व्यवस्थाओं को शैव, वैष्णव, बौद्ध, जैन धर्मावलम्बियों ने भी प्रभावित किया है। रथ का रूप श्रद्धा के रस से परिपूर्ण होता है। वह चलते समय शब्द करता है। उसमें धूप और अगरबत्ती की सुगंध होती है। इसे भक्तजनों का पवित्र स्पर्श प्राप्त होता है। रथ का निर्माण बुद्धि, चित्त और अहंकार से होता है, ऐसे रथ रूपी शरीर में आत्मा रूपी भगवान जगन्नाथ विराजमान होते हैं। इस प्रकार रथयात्रा शरीर और आत्मा के मेल की ओर संकेत करता है और आत्मदृष्टि बनाए रखने की प्रेरणा देती है। रथयात्रा के समय रथ का संचालन आत्मा युक्त शरीर करता है जो जीवन यात्रा का प्रतीक है। यद्यपि शरीर में आत्मा होती है तो भी वह स्वयं संचालित नहीं होती, बल्कि उसे माया संचालित करती है। इसी प्रकार भगवान जगन्नाथ के विराजमान होने पर भी रथ स्वयं नहीं चलता बल्कि उसे खींचने के लिए लोक-शक्ति की आवश्यकता होती है। इतिहास पौराणिक कथाओं के अनुसार 'राजा इन्द्रद्युम्न' भगवान जगन्नाथ को 'शबर राजा' से यहां लेकर आये थे तथा उन्होंने ही मूल मंदिर का निर्माण कराया था जो बाद में नष्ट हो गया। इस मूल मंदिर का कब निर्माण हुआ और यह कब नष्ट हो गया इस बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं है। 'ययाति केशरी' ने भी एक मंदिर का निर्माण कराया था। वर्तमान 65 मीटर ऊंचे मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में चोल 'गंगदेव' तथा 'अनंग भीमदेव' ने कराया था। परंतु जगन्नाथ संप्रदाय वैदिक काल से लेकर अब तक मौजूद है। पुरी का मंदिर रथयात्रा के समय भक्तों को प्रतिमाओं तक पहुँचने का अवसर मिलता है। पुरी का जगन्नाथ मंदिर भक्तों की आस्था केंद्र है, जहाँ पूरे वर्ष भक्तों का मेला लगा रहता है। पुरी का जगन्नाथ मंदिर उच्चस्तरीय नक़्क़ाशी और भव्यता लिए प्रसिद्ध है। रथोत्सव के समय इसकी छटा निराली होती है। पुरी के महान मन्दिर में तीन मूर्तियाँ हैं - भगवान जगन्नाथ की मूर्ति, बलभद्र की मूर्ति, उनकी बहन सुभद्रा की की मूर्ति। ये सभी मूर्तियाँ काष्ठ की बनी हुई हैं। पुरी की ये तीनों प्रतिमाएँ भारत के सभी देवी – देवताओं की तरह नहीं होतीं। यह मूर्तियाँ आदिवासी मुखाकृति के साथ अधिक साम्यता रखती हैं। पुरी का मुख्य मंदिर बारहवीं सदी में राजा अनंतवर्मन के शासनकाल के समय बनाया गया। उसके बाद जगन्नाथ जी के 120 मंदिर बनाए गए हैं। विशाल मंदिर जगन्नाथ के विशाल मंदिर के भीतर चार खण्‍ड हैं - 1.प्रथम भोगमंदिर, जिसमें भगवान को भोग लगाया जाता है। 2.द्वितीय रंगमंदिर, जिसमें नृत्‍य-गान आदि होते हैं। 3.तृतीय सभामण्‍डप, जिसमें दर्शकगण (तीर्थ यात्री) बैठते हैं। 4.चौथा अंतराल है। जगन्‍नाथ के मंदिर का गुंबद 192 फुट ऊंचा और चवक्र तथा ध्‍वज से आच्‍छन्‍न है। मंदिर समुद्र तट से 7 फर्लांग दूर है। यह सतह से 20 फुट ऊंची एक छोटी सी पहाड़ी पर स्‍थित है। पहाड़ी गोलाकार है, जिसे 'नीलगिरि' कहकर सम्‍मानित किया जाता है। अन्‍तराल के प्रत्‍येक तरफ एक बड़ा द्वार है, उनमें पूर्व का द्वार सबसे बड़ा और भव्‍य है। प्रवेश द्वार पर एक 'बृहत्‍काय सिंह' है, इसीलिए इस द्वार को 'सिंह द्वार' भी कहा जाता है। यह मंदिर 20 फीट ऊंची दीवार के परकोटे के भीतर है जिसमें अनेक छोटे-छोटे मंदिर है। मुख्य मंदिर के अलावा एक परंपरागत डयोढ़ी, पवित्र देवस्थान या गर्भगृह, प्रार्थना करने का हॉल और स्तंभों वाला एक नृत्य हॉल है। सदियों से पुरी को अनेक नामों से जाना जाता है जैसे - नीलगिरि, नीलाद्री, नीलाचंल, पुरुषोत्तम, शंखक्षेत्र, श्रीक्षेत्र, जगन्नाथ धाम और जगन्नाथ पुरी। यहां पर बारह महत्त्वपूर्ण त्यौहार मनाये जाते हैं, लेकिन इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण त्यौहार जिसने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की है, वह रथयात्रा ही है। दस दिवसीय महोत्सव पुरी का जगन्नाथ मंदिर के दस दिवसीय महोत्सव की तैयारी का श्रीगणेश अक्षय तृतीया को श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों के निर्माण से हो जाता है। कुछ धार्मिक अनुष्ठान भी किए जाते हैं। गरुड़ध्वज जगन्नाथ जी का रथ 'गरुड़ध्वज' या 'कपिलध्वज' कहलाता है। 16 पहियों वाला यह रथ 13.5 मीटर ऊँचा होता है जिसमें लाल व पीले रंग के वस्त्र का प्रयोग होता है। विष्णु का वाहक गरु़ड़ इसकी रक्षा करता है। रथ पर जो ध्वज है, उसे 'त्रैलोक्यमोहिनी' या ‘नंदीघोष’ रथ कहते हैं। तालध्वज बलराम का रथ 'तलध्वज' के नाम से पहचाना जाता है। यह रथ 13.2 मीटर ऊँचा 14 पहियों का होता है। यह लाल, हरे रंग के कप़ड़े व लक़ड़ी के 763 टुक़ड़ों से बना होता है। रथ के रक्षक वासुदेव और सारथी मताली होते हैं। रथ के ध्वज को 'उनानी' कहते हैं। 'त्रिब्रा', ;घोरा', 'दीर्घशर्मा' व 'स्वर्णनावा' इसके अश्व हैं। जिस रस्सी से रथ खींचा जाता है, वह 'वासुकी' कहलाता है। पद्मध्वज या दर्पदलन सुभद्रा का रथ 'पद्मध्वज' कहलाता है। 12.9 मीटर ऊँचे 12 पहिए के इस रथ में लाल, काले कप़ड़े के साथ लकड़ी के 593 टुकड़ों का प्रयोग होता है। रथ की रक्षक 'जयदुर्गा' व सारथी 'अर्जुन' होते हैं। रथध्वज 'नदंबिक' कहलाता है। 'रोचिक', 'मोचिक', 'जिता' व 'अपराजिता' इसके अश्व होते हैं। इसे खींचने वाली रस्सी को 'स्वर्णचूडा' कहते हैं। दसवें दिन इस यात्रा का समापन हो जाता है। जगन्नाथ जी की रथयात्रा में श्रीकृष्ण के साथ राधा या रुक्मिणी के स्थान पर बलराम और सुभद्रा होते हैं। इस सम्बंध में कथा इस प्रकार है - एक बार द्वारिका में श्रीकृष्ण रुक्मिणी आदि राजमहिषियों के साथ शयन करते हुए निद्रा में राधे-राधे बोल पड़े। महारानियों को आश्चर्य हुआ। सुबह जागने पर श्रीकृष्ण ने अपना मनोभाव प्रकट नहीं किया। रुक्मिणी ने रानियों से बात की कि वृंदावन में राधा नाम की गोपकुमारी है जिसको प्रभु हम सबकी इतनी सेवा, निष्ठा और भक्ति के बाद भी नहीं भूल पाये है। राधा की श्रीकृष्ण के साथ रासलीलाओं के विषय में माता रोहिणी को ज्ञान होगा। अत: उनसे सभी महारानियों ने अनुनय-विनय की, कि वह इस विषय में बतायें। पहले तो माता रोहिणी ने इंकार किया किंतु महारानियों के अति आग्रह पर उन्होंने कहा कि ठीक है, पहले सुभद्रा को पहरे पर बिठा दो, कोई भी अंदर न आ पाए, चाहे वह बलराम या श्रीकृष्ण ही क्यों न हों। माता रोहिणी ने जैसे ही कथा कहना शुरू किया, अचानक श्रीकृष्ण और बलराम महल की ओर आते हुए दिखाई दिए। सुभद्रा ने उन्हें द्वार पर ही रोक लिया, किंतु श्रीकृष्ण और राधा की रासलीला की कथा श्रीकृष्ण और बलराम दोनो को ही सुनाई दी। उसको सुनकर श्रीकृष्ण और बलराम अद्भुत प्रेमरस का अनुभव करने लगे, सुभद्रा भी भावविह्वल हो गयी। अचानक नारद के आने से वे पूर्ववत हो गए। नारद ने श्री भगवान से प्रार्थना की कि - 'हे प्रभु आपके जिस 'महाभाव' में लीन मूर्तिस्थ रूप के मैंने दर्शन किए हैं, वह सामान्यजन के हेतु पृथ्वी पर सदैव सुशोभित रहे। प्रभु ने तथास्तु कहा।
रथ का निर्माण 

भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के लिए रथों का निर्माण लकड़ियों से होता है। इसमें कोई भी कील या काँटा, किसी भी धातु का नहीं लगाया जाता। यह एक धार्मिक कार्य है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता रहा है। रथों का निर्माण अक्षय तृतीया से 'वनजगा' महोत्सव से प्रारम्भ होता है तथा लकड़ियाँ चुनने का कार्य इसके पूर्व बसन्त पंचमी से शुरू हो जाता है। पुराने रथों की लकड़ियाँ भक्तजन श्रद्धापूर्वक ख़रीद लेते हैं और अपने–अपने घरों की खिड़कियाँ, दरवाज़े आदि बनवाने में इनका उपयोग करते हैं

जगन्नाथ मंदिर पुरी महाप्रसाद

मन्दिर की रसोई में एक विशेष कक्ष रखा जाता है, जहाँ पर महाप्रसाद तैयार किया जाता है। इस महाप्रसाद में अरहर की दाल, चावल, साग, दही व खीर जैसे व्यंजन होते हैं। इसका एक भाग प्रभु का समर्पित करने के लिए रखा जाता है तथा इसे कदली पत्रों पर रखकर भक्तगणों को बहुत कम दाम में बेच दिया जाता है। जगन्नाथ मन्दिर को प्रेम से संसार का सबसे बड़ा होटल कहा जाता है। मन्दिर की रसोई में प्रतिदिन बहत्तर क्विंटल चावल पकाने का स्थान है। इतने चावल एक लाख लोगों के लिए पर्याप्त हैं। चार सौ रसोइए इस कार्य के लिए रखे जाते हैं। पुरी के जगन्नाथ मंदिर की एक विशेषता यह है कि मंदिर के बाहर स्थित रसोई में 25000 भक्त प्रसाद ग्रहण करते हैं। भगवान को नित्य पकाए हुए भोजन का भोग लगाया जाता है। परंतु रथयात्रा के दिन एक लाख चौदह हज़ार लोग रसोई कार्यक्रम में तथा अन्य व्यवस्था में लगे होते हैं। जबकि 6000 पुजारी पूजाविधि में कार्यरत होते हैं। उड़ीसा में दस दिनों तक चलने वाले एक राष्ट्रीय उत्सव में भाग लेने के लिए दुनिया के कोने-कोने से लोग उत्साहपूर्वक उमड़ पड़ते हैं। एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि रसोई में ब्राह्मण एक ही थाली में अन्य जाति के लोगों के साथ भोजन करते हैं, यहाँ जात-पाँत का कोई भेदभाव नहीं रखा जाता।

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Thursday, April 19

श्री राम जन्मोत्सव





भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी।।
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी।
भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी।।

कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता।
माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता।।
करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता।
सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता।।

ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै।
मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर पति थिर न रहै।।
उपजा जब ग्याना प्रभु मुसकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै।
कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै।।
माता पुनि बोली सो मति डौली तजहु तात यह रूपा।
कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा।।
सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा।
यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा।।

दिव्य श्रीराम मंदिर
It is good to keep a temple in your home; but make your house a temple.
हमारे घर में रह रही एक विभूति चाहे वह एक छोटा सा बालक हो या चाहे बुजुर्ग हो , सभी प्रभु श्रीराम ही है ।तो क्यों न हम घर को मंदिर बनाये,उसमे रह रहे सभी को लोगो को प्रभु अंश मानकर सभी से अच्छा व्यवहार करे । आज मंदिर बनाने की आवश्यकता नहीं है, आज हमारे घर को ही दिव्य मंदिर बनाने की जरुरत है । यह सच है कि समाज का निर्माण हम मनुष्य ही करते हैं। ठीक उसी तरह, यदि परिवार के सदस्य मिलकर एक निश्चित स्थान पर रहते हैं, तो घर का निर्माण होता है। यदि बारीक विश्लेषण किया जाए, तो हम पाएंगे कि हमारा घर एक मंदिर के समान होता है। वास्तव में, हम सभी ईश्वर का आशीर्वाद पाने के लिए मंदिर जाते हैं। हमारे घरों में भी ईश्वर के समान बडे-बुर्जुग होते हैं, जो हममें अच्छे संस्कार डालकर आशीर्वाद देते हैं। सच तो यह है कि घर भव्य भवन हो या झोपडा, उसमें व्यक्तित्व विकास का यज्ञ हमेशा चलता ही रहता है। इसलिए हमारा घर मंदिर के समान ही होता है। पहचान निर्धारित करता है घर | ध्यान रखें कि आप किसी ऊंचे पद पर हैं या अपना व्यवसाय चलाते हैं, हर स्थिति में आपकी भाषा-शैली से ही आपके घर के संस्कार झलकेंगे। यदि आप बातचीत के दौरान कटु भाषा का प्रयोग करते हैं, तो सामने वाला व्यक्ति इसके लिए आपको घर में दिए गए संस्कार को दोषी ठहरा सकता है। कहने का मतलब यही है कि आपकी पहचान घर ही निर्धारित करता है। इसलिए न केवल घर में, बल्कि घर के बाहर भी हमें मृदु-वाणी का प्रयोग करना चाहिए। यह संभव है कि हमें कभी-कभी परिस्थितिवश कठोर शब्दों का प्रयोग करना पडता है, लेकिन घर में प्रवेश करते ही हमें सावधान इसलिए भी हो जाना चाहिए, क्योंकि यहां उम्र में छोटे सदस्य भी रहते हैं, जिन पर हमारे आचार-व्यवहार का बुरा प्रभाव पडता है।
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Tuesday, April 3

दिव्य प्रेम~श्रीप्रेममाधुरी जी






श्रीप्रेम माधुरीजी नित्य सत्य एक मात्र अपने प्रियतम श्रीश्यामसुन्दर की सुख विधाता  है।वे इतनी त्यागमयी है , इतनी मधुर-स्वभावा है कि अचिंत्यानंत गुण-गन की अनंत हो कर भी अपने प्रियतम श्रीकृष्ण की अपेक्षा से सदा सर्व सद्गुण हीन  का अनुभव करती है । वे परिपूर्ण प्रेम प्रतिमा होने पर भी अपने में प्रेम का सर्वथा अभाव देखती है ।वे समस्त सौन्दर्य की एकमात्र निधि होने पर भी अपने को सौन्दर्य रहित मानती है और पवित्रतम सहज सरलता उनके स्वभाव की सहज वास्तु होने पर भी वे अपने में कुटिलता तथा दंभ के दर्शन करती और अपने को धिक्कार देती है ।वे अपनी एक अन्तरंग सखी से कहती है -
सखी री! हों  अवगुण की खान ।
तन गोरी, मन करी भरी,पातक पूरन प्रान ।।
नहीं त्याग रंचक मो मन में भर्यो अमित अभिमान ।
नहीं प्रेम कौ लेस, रहत नित निज सुख कौ ही ध्यान ।।
जग के दुःख-अभाव सतावे, हो मन पीड़ा-भान ।
तब तेहि दुःख दृग स्त्रवे अश्रु जल, नही कछु प्रेम-निदान ।।
तिन दुःख अंसुवन कौ दिखरावो हौं सूचि प्रेम महँ ।
करू कपट, हिय-भाव दुरावौ, रचौ स्वांग स-ज्ञान ।। 

जब श्यामसुंदर  उनके प्रति अपनी प्रेम-कृतज्ञता का एक शब्द  भी उच्चारण कर बैठते अथवा दिव्य प्रेम का पात्र बनाने में अपने सौभाग्य-सुख का तनिक सा संकेत भी कर जाते तो श्रीराधाजी अत्यंत संकोच में पड़कर लज्जा के मारे गड़ सी जाती । एक बार उन्होंने श्यामसुंदर से रोते रोते कहा-
तुम से सदा लिया ही मैंने, लेती-लेती थकी नही ।
अमित प्रेम-सौभाग्य मिला, पर मै कुछ भी दे सकी नहीं ।।
मेरी त्रुटी, मेरे दोषों को भी तुमने देखा नही  कभी ।
दिया सदा, देते न थके तुम. दे डाला निज प्यार सभी ।।
तब भी कहते-"दे न सका मै तुमको कुछ भी हे प्यारी ।
तुम-सी शीलगुणवती तुम ही, मै तुम पर बलिहारी "।
क्या मै कहू प्रान-प्रियतम से, देख लजाती अपनी ओर ।
मेरी हर करनी में ही तुम प्रेम देखते नंदकिशोर ।।
ऐसा दिव्य प्रेम है श्रीप्रेममाधुरी जी का ।





किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए किशोरीजी से क्षमा मांगते है ।
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Friday, March 23

केदार राग~भक्त


यह राग कल्याण थाट से निकलता है। इसमें शुद्ध व तीव्र दोनों "म" लगाये जाते है। इसके आरोह में "रे" और "ग" को नहीं लगाते और अवरोह में "ग" नहीं लगाते इसलिये इसकी जाति औडव-षाडव मानी जाती है। वादी स्वर "म" और सम्वादी स्वर "स" माना जाता है। गाने बजाने का समय रात का पहला प्रहर है। आरोह - स म म प ध प नी ध सं।
अवरोह--सं नी ध प श प ध प म ग म रे स।
पकड़--स म म प ध प म रे स।
 use the scroll
भक्त नरसी जी के विषय में यह विख्यात है कि जब वे मंदिर में भगवान के सम्मुख बैठकर केदार राग में भजन गाते थे तो भगवान के गले की माला उनके गले में आ जाती थी। भगवान की नरसी जी पर ऐसी कृपा देखकर लोग उनका बड़ा आदर–सम्मान करने लगे और उनकी भक्ति की सराहना करने लगे। कुछ लोगों से भक्त जी का ऐसा मान–सम्मान सहन न हुआ और वे दिन–रात ईष्र्या की अग्नि में जलने लगे। ऐसे व्यक्तियों की दशा का वर्णन करते हुए सत्पुरुष फरमाते है:– प्रभु के नाम–सुमिरण के प्रताप से सेवक मान–प्रतिष्ठा प्राप्त करता है और उसकी दशों दिशाओं में अर्थात् सब ओर शोभा होती है, परन्तु दुष्ट निन्दक उसकी प्रतिष्ठा को तनिक भी सहन नहीं कर पाता। इस प्रकार वह अपने हृदय रूपी घर में स्वयमेव ही ईष्र्या की अग्नि प्रज्वलित कर लेता है। किन्तु इससे भक्त का तो कुछ भी नहीं बिगड़ता, न ही निन्दक उसे कुछ हानि पहुंचा सकता है। कथन भी है:– दुष्ट निन्दक लोग भक्तों की बढ़ाई को सहन नहीं कर सकते, क्योंकि उन्हें दूसरों की भलाई अच्छी नहीं लगती। किन्तु सत्यस्वरूप परमात्मा के साथ जिनकी प्रीति हो जाती है, कोई झख मार कर भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। एक बार तीर्थ यात्राा करते हुए कुछ साधु महात्मा उस गांव की ओर आ निकले और पूछते–पूछते भक्त नरसी मेहता जी के घर जा पहुंचे। उस समय नरसी जी के घर में अन्न का दाना भी नहीं था। नरसी जी सोचने लगे– अब क्या किया जाए? साधु महात्मा घर में आकर भूखे जाएं, यह तो मेरे लिए बड़ी लज्जा की बात है। अच्छा! धरणीधर राय के पास चलता हुं, कदाचित् वे कुछ सहायता कर दें। यह सोचकर वे धरणीधर राय के घर गए। धरणीधर राय उनका अत्यन्त सम्मान करते थे। उन्होंने उठकर भक्त जी का सम्मान किया और उन्हें आसन पर बैठाया, तत्पश्चात् बोले– ‘‘आज कैसे कृपा की?‘‘ भक्त जी ने कहा– ‘‘आज मेरी कुटिया पर कुछ साधु–महात्मा पधारे हैं। उनके भोजन का प्रबन्ध करना है, इसलिए मुझे कुछ धन की आवश्यता है। आप मुझे साठ रुपए उधार दे दें, मैं आपको कुछ दिन बाद ब्याज सहित वापस कर दूँगा। मेरे पास जो कुछ है, आप उस में से जो वस्तु कहें, मैं गिरवी रख देता हूँ।‘‘ धरणीधर राय ने कहा– ‘आप कैसी बातें कर रहे है? आपसे मैं ब्याज लूंगा? आप सहर्ष रुपए ले जाएं और जब आप की इच्छा हो वापस करें।‘ यह कह कर उन्होंने रुपए निकाले और भक्त जी के आगे रख दिए। भक्त नरसी जी ने कहा– ‘जब तक आप कोई चीज गिरवी नहीं रखेंगे, मैं रुपए नहीं लूंगा।‘ धरणीधर राय जी ने कई बार कहा कि आप रुपए ले जाएं, परन्तु जब भक्त जी न माने तो प्रभु–पे्ररणा से धरणीधर जी के मुख से निकल गया कि यदि आपकी ऐसी ही इच्छा है तो फिर आप अपना केदार राग मेरे पास गिरवी रख दीजिए। यह कह कर उन्होंने कागज और कलम दवात भक्त जी के आगे रख दिए। भक्त जी ने केदार राग गिरवी रखने की बात लिख कर अपने हस्तााक्षर कर दिए। ईष्र्यालु लोगों को जब यह विदित हुआ कि भक्त नरसी जी ने केदार राग गिरवी रख दिया है तो इसे उपयुक्त अवसर जान कर वे राजा के पास गए और माला वाली घटना सुनाकर बोले– राजन् ! यह सब झुठ है, छल है। नरसी जादू के द्वारा ऐसा करके लोगों को धोखा देता है जिससे कि लोग यह चमत्कार देखकर उसे सच्चा भक्त समझें और उनके अनुयायी हो जाएं। इसलिए राजा साहिब को चाहिए कि ऐसे जादूगर को कड़े से कड़ा दण्ड दें, क्योंकि जादू के द्वारा लोगों को धोखा देकर नरसी भक्ति को लांछित कर रहा है। ईष्र्यालु लोगों का यह विचार था कि केदार राग तो भक्त जी ने गिरवी रख दिया है, इसलिए उस राग में तो वे भजन गा नहीं सकते और जब केदार राग में वे भजन नहीं गाएंगे तो माला भी उनके गले में नहीं पड़ेगी: फलस्वरूप उन्हें मुंह की खानी पड़ेगी। राजा ने कई लोगों से भक्त नरसी मेहता की महिमा सुनी थी। उस ने विचार किया कि पूरी तरह से सच–झुठ की जांच किए बिना किसी को दोषी ठहराना कदापि उचित नहीं। इस लिए कोई ऐसा उपाय करना चाहिए जिससे भक्त जी की सच्चाई की परीक्षा हो जाए। यदि वे सच्चे हुए तो इन शिकायत करने वालों का मुंह अपने आप बन्द हो जाएगा और यदि यह माला वाली बात झुठी हुई तो भक्त जी की पोल खुल जाएगी। यह सोचकर राजा ने भक्त नरसी मेहता को दरबार में बुलाया और शिकायत करने वालों की ओर संकेत करते हुए कहा– ये लोग आपकी शिकायत लेकर आए है कि आपकी भक्ति आडम्बर पूर्ण है और आप चमत्कार दिखाकर लोगों को धोखा देते और अपने जाल में फंसाते है। मैंने भी कई लोगों के मुंह से सुना है कि जब आप भगवान के सम्मुख बैठकर भजन गाते है। मैं देखना चाहता हूं कि यह बात कहां तक सच है। इसके लिए मैंने एक उपाय सोचा है। यह कहकर राजा ने निकट रखी एक पुष्पमाला उठाई और उन्हें देते हुए कहा– यह माला लीजिए और राज मन्दिर में चलकर हम सबके सामने भगवान् को पहनाइए। मैं स्वयं मन्दिर का ताला बन्द करके चाबी अपने पास रखूंगा। इस समय अन्धेरा होने वाला है। यदि कल सूर्योदय से पहले यह माला आपके गले में आ जाएगी तो मैं समझूंगा कि आपकी भक्ति सच्ची है और यदि ऐसा न हुआ तो फिर इन सब की शिकायत सच्ची समझकर आपको उचित दण्ड दिया जाएगा। भक्त जी ने माला ले ली और सब लोगों के सम्मुख भगवान् को पहना दी। तत्पश्चात् राजा ने मन्दिर के पट बन्द करके बाहर ताला लगा दिया और सब लोग मन्दिर के सामने बैठ गए। भक्त नरसी जी सोचने लगे– केदार राग तो मैंने गिरवी रखा हुआ है, इसलिए उस राग में तो मैं भजन गा नहीं सकता, क्योंकि ऐसा करना गलत है। फिर क्या किया जाए ? चलो ! जो होगा देखा जाएगा। अधिक से अधिक राजा कारागृह में ही तो डलवा देगा। मुझे तो भगवान् का भजन सुमिरण करना है, घर में क्या और कारागृह में क्या ? भगवान् की जैसी इच्छा होगी वैसा ही होगा, फिर मैं क्यों चिन्ता करू ? यह सोचकर वे स्वरचित भजन गाने लगे। नगर के अनेकों नर नारी राजमन्दिर के प्रांगण में एकत्रा हो गए। भजन कीर्तन का ऐसा समां–बंधा कि किसी को भी समय का पता न लगा यहां तक कि रात समाप्त होने पे आ गई। भगत जी तो निश्चिन्त होकर भजन कीर्तन में संलग्न थे, परन्तु भगवान् को तो अपने भक्त की चिन्ता थी, क्योंकि उनका तो बिरद है कि:– भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र जी महाराज भक्त अजुर्न के प्रति कथन करते है कि जो अनन्य प्रेमी भक्तजन मुझ परमेश्वर को सच्चाई से, शुद्ध हृदय से तथा निष्कामभाव से स्मरण करते है, उन नित्य निरन्तर मेरा चिन्तन करने वाले भक्तों की सहायता तथा रक्षा करना मैं अपना प्रथम कत्र्तव्य समझता हूँ। इसलिए परमसन्त श्री कबीर साहिब अत्यन्त विश्वासपूर्वक कथन करते है कि:– फ़रमाते है कि मैं किसी बात की चिन्ता क्या करूं, क्योंकि मेरे चिन्ता करने से होता ही क्या है ? होना तो वही कुछ है जो प्रभु की इच्छा है। और जबकि प्रभु को स्वय्र ही मेरी चिन्ता है और वे मेरे हर तरह से रक्षक एवं सहायक है, इसलिए मैं किसी प्रकार की चिन्ता नहीं करता। भक्त नरसी जी तो निश्चिन्त होकर भजन कीर्तन में मग्न हो गए, उधर भगवान ने क्या किया कि जूनागढ़ पहुंच कर नरसी जी का रूप धारण किया और धरणीधर राय के घर जा पहुंचे और लगे दरवाजा खटखटाने। कुछ देर बाद धरणीधर की नींद टूटी और उन्होंने आवाज़ दी– कौन है ? भगवान् ने उत्तर दिया– मैं नरसिंहराम हुं। आपका ऋण चुकाने आया हूं: द्वार खोलिए। भक्त नरसी जी की आवाज़ पहचान कर धरणीधर राय ने द्वार खोला, भक्त जी के वेष में भगवान् को प्रणाम किया और फिर बोले–भक्त जी ! इस समय रात को आपको कष्ट करने की क्या आवश्यकता थी। रुपए फिर आ जाते। भगवान् ने उत्तर दिया– सो तो ठीक है, परन्तु जब कहीं से रुपए मिल गए तो उन्हें घर पर रखने से भी क्या लाभ ? मैंने यही उचित समझा कि रुपए शीघ्रातिशीध्रआप तक पहुंचा दूं। दूसरे मुझे केदार राग मुक्त कराने की भी शीघ्रता थी, क्योंकि अभी इसी राग में भजन गाना आवश्यक है। यह कहते हुए भक्तरुप भगवान् ने रुपए धरणीधर के हाथ में पकड़ा दिए। धरणीधर जी ने तुरन्त नरसी जी का लिखा प्रतिज्ञा–प्रत्रा निकाला और उसपर भरपाई लिखकर भगवान् के हवाले कर दिया। प्रतिज्ञाप्रत्रा लेकर भगवान् राज–मन्दिर में आए और कागज भक्त जी की झोला में डाल दिया। प्रभु–प्ररणा से उसी समय भक्त जी को चेत हुआ और उनकी दृष्टि उस कागज पर गई। भक्त जी ने कागज उठाया तो यह देखकर अत्यन्त विस्मित हुए कि यह तो उन्हीं का लिखा हुआ प्रतिज्ञापत्रा है जिस के नीचे कुछ और शब्द भी लिखे हुए है। उन्होंने उन शब्दों को मन ही मन पढ़ा। उसमें लिखा था– आज रात्रिा के अन्तिम प्रहर मुझे जगाकर भक्त नरसिंहराम मेहता जी ने मेरे साठ रुपए चुकाता कर दिए। अब वे केदार राग गा सकते है। हस्ताक्षर– धरणीधर राय। भक्त नरसी जी समझ गए कि यह यह सब भगवान् की ही कृपा है। उन्हें रोमांच हो आया और वे प्रेम–विभोर होकर नाचने लगे। यह देखकर विरोधियों ने कहा– देखो ! कैसा ढोंग कर रहा है ? सूर्योदय होने वाला है, अभी सारी पोल खुल जाएगी। किन्तु राजा माण्डलीक भक्त नरसी जी की अवस्था देखकर बहुत प्रभावित हो चुका था। वह जान गया था कि यह ढोंग नहीं, प्रत्युत प्रेम की वह उच्चतम अवस्था है जहां हर किसी की पहुंच नहीं है। उसे चिंता हुई कि सूर्योदय होने वाला है और यदि माला भक्त जी के गले में न पड़ी तो मुझे इन्हें दण्ड देना पड़ेगा। अतएव उसने भक्त जी के कन्धे झिंझोड़ते हुए कहा– भक्त जी ! सूर्योदय होने वाला है, इसलिए सचेत होइए और शर्त पूरी कीजिए। राजा के झिंझोड़ने पर जब भक्त जी को चेत हुआ तो उन्होंने देखा कि पूर्व दिशा में लालिमा छाने लगी है। भक्त जी ने सोचा कि राजा ठीक ही तो कह रहे है। फिर भगवान् ने केदार राग भी छुड़वा दिया है। यह विचार कर उन्होंने केदार राग में भजन गाना आरम्भ किया। भजन समाप्त होने की देर थी कि मन्दिर के पट अपने आप खुल गए और माला नरसी जी के गले में आ गई। यह देखकर निन्दकों के सिर अपने आप लज्जा से नीचे झुक गए। राजा माण्डलीक तो उसी क्षण नरसी जी का शिष्य हो गया: फलस्वरूप भक्त जी की महिमा पहले से भी बढ़ गई। इसी पर सत्पुरुषों के वचन है कि:– सद्गुरु के उपदेशानुसार जिन मनुष्यों के हृदय में परमात्मा की प्रीति उत्पन्न हो गई है, उनके रक्षक एवं सहायक भगवान् स्वयं बन जाते है। जिनको भगवान्का नाम प्यारा है, उनकी निंदा कोई क्या करेगा ? जिनका मन भगवान् की प्रीति में रंग जाता है, निंदक लोग उन्हें बदनाम करने के लिए व्यर्थ ही झख मारते है: वे उनका कुछ बिगाड़ ही नहीं सकते। सत्पुरुष फ़रमाते है कि जो भगवान् के नाम का सुमिरण करते है, भगवान् स्वयं उसकी रक्षा करते है। निंदकों ने जब देखा कि राजा माण्डलिक नरसी जी का शिष्य बन गया है, तो नरसी जी के चरणों में गिर पड़े और अपने अपराध के लिए क्षमा याचना करने लगे। भक्त जी के हृदय में तो किसी के प्रति द्वेष था नहीं, वे तो प्रेम की मूर्ति थे, अतएव उन्होंने उन्हें क्षमा कर दिया। उस दिन से वे सब भी सच्चे भक्त बन गए। दूसरों की उन्नति देखकर ईष्र्या द्वेष की अग्नि में जलना और व्यर्थ ही उनकी निन्दा चुगली करना महान् दोष है। जो मनुष्य इस दोष से बच जाता है, वही परमार्थ में सिद्धि प्राप्त कर सकता है। इस दोष से बच भी वही सकता है, जो हृदय में नम्रता एवं दीनता धारण कर सदा नाम सुमिरण तथा भजन ध्यान में लीन रहता है। जो मान सम्मान का भूखा हो, वह इस दोष से नहीं बच सकता। इसलिए महापुरुषों ने फ़रमाया है कि:– श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने इसीलिए मान बड़ाई तथा ईष्र्या द्वेष त्यागने का हमें उपदेश किया है, क्योंकि इनके रहते हुए जीव भक्तिमार्ग में उन्नति नहीं कर सकता। इसलिए यदि हमें अपना क्ल्याण अभीष्ट है और हम अपना लोक–परलोक संवारना चाहते है तो फिर हमें चाहिए कि श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के वचनों को हृदयंगम कर उनपर पूरी तरह आचरण करे। यही हमारे लिए कल्याणकारी मार्ग है और इसी में ही हमारी जीवात्मा का कल्याण है।

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Saturday, March 10

राधे सदा मुझ पर रहमत की नजर रखना



राधेssराधेssराधेss राधे राधे राधे
राधे सदा मुझ पर रहमत की नजर रखना..
मै दास तुम्हारा हु , इतनी तो खबर रखना..

नजर रखना..नजर रखना..
मुझ पर नजर रखना..नजर रखना ..राधे सदा मुझ पर रहमत की नजर रखना..


1.यहाँ कोई नही अपना, एक तेरा सहारा है..
मैंने देख लिया सब को..अब तुझ को पुकारा है ..
कही डूब न जाऊ मै..मेरा हाथ पकड़ रखना..राधे सदा मुझ पर रहमत की नजर रखना..
2.कब तक ठुकरओगी,कब  तक न बुलाओगी,
दोगी न हमें दर्शन, कब तक तडपाओगी,
दीदार करू तेरा जीवन का यही सपना..राधे सदा मुझ पर रहमत की नजर रखना..
राधे सदा मुझ पर रहमत की नजर रखना..

मै दास तुम्हारा हु , इतनी तो खबर रखना..
तेरे चरनन की रज पाऊ..किशोरी तेरे चरनन की रज पाऊ..
बैठी रहू कुंजन के कोने..श्यामराधिका गाऊ..किशोरी तेरे चरनन की रज पाऊ..
तेरे चरनन की रज पाऊ..किशोरी तेरे चरनन की रज पाऊ
ब्रज की रानी राधिका अष्ट सखिन के झुण्ड ।
डगर बुहारत सांवरो..जय-जय राधा कुंड ।।

तेरे चरनन की रज पाऊ..किशोरी तेरे चरनन की रज पाऊ
भक्तो ने तुमको देख लिया..संतो ने तुमको देखलिया ।
राधे कभी तो मै भी कहू..मैंने भी तुमको देखलिया ।।
तेरे चरनन की रज पाऊ..किशोरी तेरे चरनन की रज पाऊ


राधेssराधेssराधेss राधे राधे राधे
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Saturday, March 3

होरी में मत मारे दृगन की चोट रसिया



बिहारी बिहारिणी की रे मोपे यह छवि बरनी न जाये 
रंग महल में होली खेलें, अंग अंग रंग छु छाए 
तन मन मिले जुले मृदु रस में, आनंद उर न समाये 
श्री हरिदास ललित छवि निरखें, सेवत नव नव भाये






श्यामा श्याम सलोनी सूरत को सिंगार बसंती है।
सिंगार बसंती है …हो सिंगार बसंती है।
मोर मुकुट की लटक बसंती, चन्द्र कला की चटक बसंती,
मुख मुरली की मटक बंसती, सिर पे पेंच श्रवण कुंडल छबि लाल बसंती है।
श्यामा श्याम सलोनी सूरत…॥१॥
माथे चन्दन लग्यो बसंती, कटि पीतांबर कस्यो बसंती,
मेरे मन मोहन बस्यो बसंती, गुंजा माल गले सोहे फूलन हार बसंती है।
श्यामा श्याम सलोनी सूरत..॥२॥
कनक कडुला हस्त बसंती, चले चाल अलमस्त बसंती,
पहर रहे सब वस्त्र बसंती, रुनक झुनक पग नूपुर की झनकार बसंती है।
श्यामा श्याम सलोनी सूरत…॥३॥
संग ग्वालन को टोल बसंती, बजे चंग ढफ ढोल बसंती,
बोल रहे है बोल बसंती, सब सखियन में राधे की सरकार बसंती है ।
श्यामा श्याम सलोनी सूरत…॥४॥
परम प्रेम परसाद बसंती, लगे चसीलो स्वाद बसंती,
ह्वे रही सब मरजाद बसंती, घासीराम नाम की झलमल झार बसंती है।
श्यामा श्याम सलोनी सूरत..॥५॥

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Friday, March 2

राधे, हे प्रियतमे, प्राण-प्रतिमे, हे मेरी जीवन मूल


 
 
 
राधे, हे प्रियतमे, प्राण-प्रतिमे, हे मेरी जीवन मूल !
पलभर भी न कभी रह सकता, प्रिये मधुर ! मैं तुमको भूल॥
श्वास-श्वासमें तेरी स्मृतिका नित्य पवित्र स्रोत बहता।
रोम-रोम अति पुलकित तेरा आलिङङ्गन करता रहता॥

 
mohan natvar pyaro
 
नेत्र देखते तुझे नित्य ही, सुनते शद मधुर यह कान।
नासा अङङ्ग-सुगन्ध सूँघती, रसना अधर-सुधा-रस-पान॥
अङङ्ग-‌अङङ्ग शुचि पाते नित ही तेरा प्यारा अङङ्ग-स्पर्श।
नित्य नवीन प्रेम-रस बढ़ता, नित्य नवीन हृदयमें हर्ष॥
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